ये नज़्म


ये नज़्म, वो नज़्म भी हो सकती थी
जो लिखते लिखते रह गयी हो.

हुआ यूँ 
कि कलम उठाते ही नज़र पड़ गयी 
गुलज़ार वाले पुखराज के चाँद पर
और उसे सीने से लगाए फ़ैज़ के आसमान पर
और दिखी अमृता प्रीतम के स्वच्छन्द इश्क़ की पतंग
जो साहिर और इमरोज़ से होते हुए क़ायनात में उड़ती जा रही थी.

कलम उठाते ही ख़याल आया
कि बड़े शायरों के लफ्ज़ आख़िर क्यों ज़िंदा रहते हैं?
क्यों छू लेते हैं दिल के अनछुये कोने?
आख़िर क्या बात है कि ग़ालिब मियाँ अब भी चैन नहीं पाते?

फिर देखा सामने तो
उड़ते हुए दो पंछी चले जा रहे थे
उड़ान से उनकी थकान को तो अंदाज़ा नहीं हुआ
मगर खुश लग रहे थे
तो शायद घर को ही लौट रहे होंगे
ये नज़्म, वो नज़्म भी हो सकती थी
जो बयां कर पाती उन बच्चों की खुशी
जो घोंसले पर इंतज़ार में बैठे
बस अब कुछ ही देर में चहकने वाले थे.

ये नज़्म,
वो नज़्म होते होते रह गयी! 

ज़िंदगी का मतलब


बूढ़े बाबा को घेर के
बच्चों की टोली ने पूछा
बाबा कोई कहानी सुनाओ?
बाबा बोले आज कहानी नहीं
मैं तुम्हे ज़िंदगी का मतलब बताता हूँ
"हैं!! वो क्या होता है?"
बोले बच्चे

बाबा ने पहले आसमान को देखा
लंबी सांस ले शायद महसूस भी किया
फिर आँखें मूंद कर
बोलना शुरू किया

जैसे एक नदी सागर में प्रथक दिखती है
जैसे धुएें में से आग निकलती है
जैसे फलों पर पेड़ लटकते हैं
जैसे बारिश पर बादल ऊगते हैं
वैसी ही है ज़िंदगी

जैसे शाम से पहले आए रात
रात के साथ हो दिन की शुरुआत
दिन में देखें सपने खुली आँखों से
सपनों में दिखे मंज़िल सलाखों से 
वैसी ही है ज़िंदगी

जैसे सुख के ऊपर दुख
और दुख के ऊपर सुख
पीड़ा में हंसी की लहर
हंसी में किसी पीड़ा की कसक
वैसी ही है ज़िंदगी

अगड़म बगड़म
बम बम बोल बम 
अगड़म बगड़म
बम बम बोल बम 
वैसी ही है ज़िंदगी

"बाबा, ये क्या बोल रहे हो..
हमें तो कुछ समझ नहीं आ रहा
इसका तो कुछ मतलब ही नहीं निकला"
बच्चे झल्ला उठे

"Exactly!"
"यही है ज़िन्दगी!"
बाबा हँस कर बोले
और गायब हो गये! 





यादों की रोटी


मंज़िल की तलाश में जो आये हैं 
मंज़िल क्या हम पीछे छोड़ आये हैं?

ये मंज़र जो हैं बरसते आँखों में 
इन में क्यों अब तेरे ही साये हैं?

लंबा होगा सफर ये पता था 
तेरी यादों की रोटी इसलिए साथ लाये हैं.