मालामाल पॉकेट


जब जेबों में पैसे नहीं थे,
तो कुछ और चीज़ें हुआ करती थीं..

कुछ कंचे हरे नीले स्लेटी
कुछ जीते हुए कुछ बदले हुए.
कुछ टॉफियों के रैपर
जो चुपके-चुपके बड़े स्वाद ले खाईं थी.
कुछ पारदर्शी रंग बिरंगे पत्थर
समंदर से जो बटोरे थे पिछले साल.
कुछ माचिसों के खोल, सहेजे हुए गलियों से
क्युंकि डाक टिकट तो सब ही बटोरते हैं.
कुछ पेन्सिल के छिलके
क्युंकि कम्पस-बॉक्स में जगह न थी.
कुछ ट्रंप कार्ड्स
WWE वाले और क्रिकेट वाले.
कुछ पेपर बुलेट और रब्बर बैंड
पॉकेट गुलेल का निशाना चूकता नहीं अपना.
कुछ फूल और कुछ पत्ते
साइन्स की फाइल में चिपकाने को.
कुछ टूटी हुई स्लेट-पेंसिल
बहुत टेस्टी लगती थी.
और
ढेर सारे बहाने
होमवर्क न करने के.

मालामाल हुआ करती थी पॉकेट कभी अपनी,
जब जेबों में पैसे नहीं थे,
तब हम कितने अमीर थे!


ग़ज़ल - पानी के नीचे


टूट गए जो शजर* उनकी दास्तान भी खूब रही होगी
कायनात की मार उन्होंने भी खूब सही होगी

पानी के नीचे पैर तो खूब चलाये मगर
थोड़ा और नीचे ज़मीन रही होगी

आँखें अब सूख चुकीं, कुछ नहीं कहतीं
इन में समायी, कभी कोई नदी बही होगी

जाकर देखो उस घर को जिसे छोड़ आये थे
इंतज़ार में वो, अब भी देहरी पर खड़ी होगी

लिख दी जाने कितनी ग़ज़लें उस पर
एक नज़्म कम से कम तो उसने भी कही होगी. 

*शजर =  Tree 

अपने शहर में

जानी पहचानी गलियाँ
जाने पहचाने नुक्कड़
बातों के पुलिंदे
भर्ता और गक्कड़
अड्डों के चक्कर
दोस्तों से टक्कर
गुड़ की चाय
गली की गाय
सड़क के गड्ढों से भी है पहचान
अपने शहर में!

चाट की चटख
बाज़ार की दमक
गलियों की लचक
धूपबत्ती की महक
रेड़ियों के मेले
क़ुल्फ़ियों के ठेले
भीड़ के हल्ले
रोशन मोहल्ले
दिवाली सी लगे है हर शाम
अपने शहर में!

पुराने रास्तों पर
नयी इमारतों के घर
नये कबूतर हैं बसते अब
मस्जिदों मीनारों पर.
समझे कोई भला?
शहर है या है लड़ी ज़िंदगी की
जहाँ वक़्त ख़ूब ज़ौहर दिखलाता है
कुछ नहीं बदलता लेकिन,
सब कुछ बदल जाता है..
बरसों बाद भी
लगे है दिल को आराम
अपने शहर में!