कशमकश !

हर चीज़ में लगते हैं इलज़ाम यहाँ
हर आंसू पे हंसते हैं इंसान यहाँ
सही को भी गलत समझा जाता है
गलतियों को कभी माफ़ नहीं किया जाता है यहाँ

झूठे चेहरे भरे पड़े हैं बाजारों में
सच्चाई कहीं खो सी गयी है राहों में
सिर्फ सूनापन ही रह गया है इन आँखों में
खुशियां मुस्कुराती हैं बस ख़्वाबों में

मुझपर हंसते हुए दिन, रात और शामें बीत जाती हैं
भीड़ में रहते हुए भी तन्हाइयां जीत जाती हैं
जिन लम्हों में खुल के हंसे थे कभी,
उन्ही की यादें अब अक्सर रुला जाती हैं

खुश रहो, जियो कहते हैं मुझसे ये सभी
यूँ पल पल मरने से तो अच्छा ,
ये सांसें थम जाएँ अभी !

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