मैं

जिस दोस्त को ढूँढता था मैं
कहाँ मिला कभी वो, कौन निकला
ता उम्र पीछा करता रहा जिसका
मेरे सिवा कोई और न निकला

वादे कच्चे कई
पकाए धीमी आँच पर
सोचा था पकेंगे इसी आस में
चलते रहे हम भी काँच पर

तरसती रही आँखें जिसके दीदार के लिए
खोजा जब उसे तो मैं ऐसा फिसला
लड़ा सबसे, लड़ा खुदसे, लड़ा उससे
वो शख्स मेरा ही अक्स निकला

आवारा हुआ
नाकारा कहा गया
कहीं भी न सुना गया
जिधर गया उधर गिरा
फ़िरा तो मैं ऐसा फ़िरा
जिसे ढूँढता रहा हर गली में
मेरे सिवा कोई और न निकला
मेरा अहम् कह लो या कुछ और
बस 'मैं' ही निकला .

2 comments:

swati :) said...

hey bhaiya,
dono poems bohottttt acchi hain. haan hindi aur urdu kahin kahin mixed hai, to thoda dekh lena..
otherwise both r really good.esp manzilein one..
aur haan, maine comment "bina kisi DaBaaaV" ke diya hai ;)

Raj said...

hey aditya...
feeling gr8 to go through ur profile..
i love to write poetry too.. but a bit lazy to write them on my diary..
well... keep rocking dude..