ऐंवेयी

ऐंवेयी सोचा बैठे बैठे 
कि लिखें कुछ एक दो पंक्तियाँ 
भीनी भीनी महकी महकी 
हरी भरी ताज़ी सब्जी जैसी 

कितने गालिब कितने मीर 
हुए न क्या ये बोर कभी 
लिखते रहे लिखते गए
कुछ हज़म हुआ, कुछ ऐंवेयी  

पका डाला है बाप मेरे तूने ! 
कहते हैं मेरे साथी सभी
ये लिखने का शौक है या मुसीबत  
भैया बंद हो जा बस अभी ! 

सीधी साधी बातें  
घुमा फिरा के 
शब्दों में लपेट लपेट 
गोल मटोल 
टालम टोल
धक्का मुक्की 
कच्ची पक्की 
झूठ मूठ 
भविष्य और भूत
बेवजह यूँ ही 
क्या तू भी 
कहने से अच्छा 
सुन ले बच्चा कि 

अब बस :)

प्रेरणा स्त्रोत : "पढने योग्य लिखा जाए, इससे कहीं बेहतर है कि लिखने योग्य किया जाए !"

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