क्या हूँ मैं?



मैं क्या हूँ
ये कैसे तुम्हे बतलाऊं 
इस सूरत के पीछे सीरत है कैसी 
ये कैसे तुम्हे समझाऊं? 

एक राज़ हूँ गहरा सा
भीड़ में बहका सा  
शोर में तन्हा  
तन्हाई में अशांत  

एक बच्चा हूँ अभी भी 
लेकिन बड़ों सा बनता हूँ
लम्बी डगरिया पे 
मैं तो बहता दरिया हूँ..  

एहसास कई देखे हैं 
देखूंगा और देखता हूँ रोज़ 
फिर भी सोचता हूँ 
और कशमकश में रहता हूँ 
कि मैं क्या हूँ?
कि मैं क्यूँ हूँ?  

इक्षायें कई जेब में लिए
रोज़ घर से निकलता हूँ 
आदमी हूँ साब
इक्षाओं में ही फिर उलझता हूँ  

लड़ता हूँ इस दुनिया से 
गुस्से में कभी 
तो कभी ख़ुशी ख़ुशी 
जिए जाता हूँ 
एक कहानी हूँ मैं 
जिसका कोई अंत नहीं 
साँसे रोक नहीं सकती मुझे 
विचार कह लो या कह लो आब-ओ-हवा
मैं.. 
मैं क्यूँ हूँ? 
क्या हूँ मैं?  

हाँ, शायद मैं 'क्या' ही हूँ.. 
बस एक प्रश्न ! 
जो बनाता है मुझे 'मैं'  
जो देता है मुझे अस्तित्व  
आखिर जो सवाल न कर सके 
वो हस्ती ही क्या !  
और जो हँस न सके 
वो ज़िन्दगी ही क्या !

:)

5 comments:

esha said...

surat k peeche kaisi bhi seerat nhi hai re.......surat wahi hai teri jo seerat hai nd dats da best part bacha!! gud one!

Aditya ! said...

thnkuu mam... why is it that jab bhi main koi poem post karta hoon aap hamesha ol hote ho?? padhaaaai karrrro... :)

Raphael said...

Bahut acchey, mazaa aaya padh kar, i wish i could write poetry like you....

Aditya ! said...

@Raphael arrey kyun mazzaak kar rhe hain sir.. aap logon se hi to seekha hai :)

Adarsh said...

great work !
mujhe pehle se hi pata tha,.,.
yeh ladka kuch karega.