अपनी अपनी पैंत :)

अपनी अपनी पैंत ?? आप सोच रहे होंगे की अब भाई ये क्या नयी चीज़ आ गयी? अगर आप नॉर्थ इंडिया से हैं या आज की जेनरेशन से वास्ता रखते हैं, तो शायद इस शब्द से आपका परिचय पहले ही हो चुका हो. पैंत का मतलब होता है टशन बोले तो स्टाइल मारना याने की शो ऑफ करना मतलब रौब जमाना जैसे शेखी बघारना या फिर यूँ समझ लो बड़े शब्दों में की सूडो-पेर्सोनालिटी(Pseudo Personality) आपकी.... ऐसे ढेर सारे अर्थ निकाल सकते हैं आप इस लफ्ज़ के.
आइये आपको एक उदाहरण से समझाता हूँ पैंत के बारे में . किसी भी सरकारी ऑफिस में चले जाइए आप. जो सबसे बड़ा ऑफिसर होता है ना, उसकी पैंत सबसे जादा होती है. उसके नीचे वाला अफसर उसके सामने तो भीगी बिल्ली होता है, लेकिन बाकी लोगों के सामने उसकी भी पैंत कम नहीं होती. ऐसे ही क्रम चलता रहता है. सबकी अपनी अपनी पैंत का.

क्या सोच रहे हो? कि क्या बकवास है ये? अरे मैं कभी बकवास के अलावा कुछ और बात करता हूँ भला !

चलो एक और थोड़ा close example लेते हैं. घर पर जब तक पिताजी नहीं होते तब तक बच्चे पैंत में रहते हैं, शरारत करते हैं, बिंदास टीवी देखते हैं, मम्मी कि बात नहीं सुनते.. लेकिन शाम को पिताजी के घर पधारते ही ........ उनकी पैंत रफू-चक्कर हो जाती है. अब समझे? नहीं समझे!! .. मैं मान ही नहीं सकता..

चलो, एक last example देता हूँ एकदम heart वाला touching.. आप सड़क पर चले जा रहे हैं.. अकेले.. सामने से कोई सुन्दर सी सुकुमाल सी प्यारी सी(बोले तो: हॉट) कन्या आती हुई दिखाई पड़ती है. क्या करते हैं आप? छाती फूल जाती है, चौड़ में आ जाते हैं, बाल-वाल ठीक करते हैं, अपनी चाल का ध्यान रखते हैं, नज़र बचा कर देखते हैं उसे...मतलब आप तुरंत झट से अपनी पैंत में आ जाते हैं. अब समझे? अब क्यूँ नहीं समझ आएगा ! :P

तो मैं इतना सब पैंत के बारे में बोल क्यूँ रहा हूँ आखिर ? क्युंकी मैंने देखा है कई लोगों को पैंत मारते. मुझे उन्हें देख अक्सर हंसी आ जाती है. आपने भी देखा होगा. बस नोटिस नहीं किया होगा, क्युंकी क्या पता.. आप भी शायद तब अपनी पैंत में रहे हों ?

:)

बरसों बाद..

Wrote this one for my university's farewell magazine, Alvida !
Dedicated to all my friends and to the best 4 years of my life.






बरसों बाद.. जब तुम्हारी नज़र पड़ेगी
और उस पुरानी तस्वीर पर जा रुकेगी
जिसमें हम सब यार हँस रहे हैं
एक केक के टुकड़े के लिए लड़ रहे हैं
तब इन दिनों को फिर से जीना नहीं चाहोगे भला ?


जब धूल भरी कोई फटेहाल कॉपी मिलेगी
जिसमें होगा वो tic-tac-toe का अधूरा गेम
जिसे खेलते हुए हमें class से बाहर निकाला गया था
याद कर.. तुम हँस पाओगे क्या ?


उसी कॉपी में रखा हुआ वो सूखा गुलाब
अधूरे प्यार की याद दिला जाए शायद
दोस्तों ने खूब मज़ाक उड़ाया था
ना
हँसते हँसते तुम टाल गए थे अपने दिल की बात
अब मीठी सी याद के सिवा कुछ बचा है क्या?


जब झगड़े में कसम खा लेते टांगे तोड़ने की :)

एक सॉरी, कोल्ड ड्रिंक और समोसे के बाद
ऐसे झगड़ा भूलते जैसे कुछ हुआ ही ना
हो
आज दुनिया कि formality में वो अपनापन कहीं पाओगे भला
  ?


Test में cheating करने पर जब साथ में पकड़े गए थे
और जब तुझे 0 और मुझे 1 मिला था
"कमीने दे दिया
ना धोखा.." तुमने कहा था
वैसा प्यार भरा धोखा अब कहीं खाओगे क्या
?


"अब चाय कौन पिलाएगा?" इस सवाल पर झगड़ते थे
चिल्लर जोड़ते, शर्तों में उलझे रहते थे और ध्यान...
चाय से ज़्यादा पीने वाली पे रखते थे
चिल्लर की मिठास अब किसी चाय में पाओगे
क्या ?


जब maggi खाते, गप्पें मारते निकल जाती थी रातें

जब birthday पर wishes कम, खायी थी ज़्यादा लातें
जब जाते जाते भर आई थी सबकी आँखें
जब ऐसे यार छूटे..और ना
जाने कितने सपने टूटे..
जब हमने decide किया था कि contact में रहेंगे
जब किसी ने 'keep-in-touch' को 'keep-touching' कहा था :')

याद है ना
?

बरसों बाद.. आज पता नहीं सारे वादे..
सारे contacts खो से गए हैं
दुनिया की रफ़्तार में फसे
भूल भुलैया में गुम गए हैं
कौन कहाँ है.. पता ही नहीं कुछ


बस इतनी उम्मीद है कि
कभी इस ओर मुड़ कर देखो
तो रोना मत, हँस देना..


बरसों बाद.. जब नज़र पड़े तुम्हारी

तो रोना मत, हँस देना..
इतनी सी है कसम
बस इतना ही मांग रही यारी..

पूछिये कभी खुद से

This poem can be categorized under 'aiweyii writings'. This is the outcome when i listen to too much of Jagjit Singh and read too much of senti shayari stuff. 

Disclaimer : Heavy dose मजनू - छाप material ahead. Read at your own risk!:)

क्या कभी प्यार था ?
हमसे क्या खुद से पूछिये
जो इश्क़ परवान चढ़ा था कभी
उसकी बची हुई राख़ से पूछिये

जहां की बातों में न आना
ज़ालिम दुनिया है इससे क्या पूछिये
ये तो चाहते हैं कोई खुश न रहे
बातों बातों में बात क्या है पूछिये

जनाब हम झूठ बहुत बोलते हैं
ऐतबार टूट चूका है अब हमसे न पूछिये
खुद पर यकीं रहा हो तो ठीक
वरना छोड़िये अब क्या पूछिए :)

वैष्णव जन तो तेने कहिये

A bhajan that has been my favourite ever since..(and Mahatma Gandhi's too, while the great old man almost completely incorporated the preachings of this bhajan in his life, i am still trying to inculcate them.)

वैष्णव जन तो तेने कहिये जे पीड पराई जाणे रे,
पर दु:खे उपकार करे तोये मन अभिमान न आणे रे,


सकल लोकमां सहुने वंदे निंदा न करे केनी रे,
वाच काछ मन निश्चल राखे धन धन जननी तेनी रे,


समदृष्टि ने तृष्णा त्यागी, परस्त्री जेने मात रे,
जिह्वा थकी असत्य न बोले, परधन नव झाले हाथ रे,


मोह माया व्यापे नहि जेने, दृढ़ वैराग्य जेना मनमां रे,
रामनाम सुताली लागी, सकल तीरथ तेना तनमां रे,


वणलॊभी ने कपटरहित जे, काम क्रोध निवार्या रे,
भणे नरसैयॊ तेनु दरसन करतां, कुण एकोतेर तार्या रे ॥



Line by line translation:
वैष्णव जन तो तेने कहिये
One who is a vaishnav

जे पीड पराई जाणे रे
Knows the pain of others

पर दु:खे उपकार करे तोये
Does good to others, esp. to those ones who are in misery

मन अभिमान न आणे रे
Does not let pride enter his mind



सकल लोकमां सहुने वंदे
A Vaishnav, Tolerates and praises the the entire world

निंदा न करे केनी रे,
Does not say bad things about anyone

वाच काछ मन निश्चल राखे
Keeps his/her words, actions and thoughts pure

धन धन जननी तेनी रे
O Vaishnav, your mother is blessed



समदृष्टि ने तृष्णा त्यागी
A Vaishnav sees everything equally, rejects greed and avarice

परस्त्री जेने मात रे
Considers some one else’s wife/daughter as his mother

जिह्वा थकी असत्य न बोले
The toungue may get tired, but will never speak lies

परधन नव झाले हाथ रे
Does not even touch someone else’s property



मोह माया व्यापे नहि जेने
A Vaishnav does not succumb to worldly attachments

दृढ़ वैराग्य जेना मनमां रे
Who has devoted himself to stauch detachment to worldly pleasures

रामनाम सुताली लागी
Who has been edicted to the elixir coming by the name of Ram

सकल तीरथ तेना तनमां रे,
For whom all the religious sites are in the mind



वणलॊभी ने कपटरहित जे
Who has no greed and deciet

काम क्रोध निवार्या रे
Who has renounced lust of all types and anger

भणे नरसैयॊ तेनु दरसन करतां
The poet Narsi will like to see such a person

कुण एकोतेर तार्या रे ॥
By who’s virtue, the entire family gets salvation

Story of a boy: School Days

In the summers of 1990, a small village boy comes to a city with his parents. His dad had just been posted in a government job. They didn't even have enough money for boy's admission in a school. One day his father's friend takes the boy with him, pays the fee and gets him into a nursery school in the colony. The spoiled village boy starts learning. He sees alphabets, numbers, games, poems, stories and falls in love with them. Of course he does not realize this at that time because he was too busy enjoying it.

The boy is then moved to a Hindi medium primary school where the monthly fee was Rs. 55. This was the best his parents could afford. He starts doing well in studies. His teachers liked him, friends loved him, and competitors envied him. The boy then moves a step ahead and after his primary education takes admission into an English medium school. Excelling in Maths, Hindi and Sanskrit from the beginning -because of his Hindi-medium-education background- he begins his long journey. But the English was intimidating. Such was the state of his English that he pronounced ‘salt’ as ‘saalt’ while ‘B e a - u t i - f u l’ was the toughest spelling he knew - that too was memorized in parts. Nobody likes a change. His fellow students in the new class loathed him and distinguished him as a dumb-ass from a third rate Hindi-medium school. Some even pitied the poor creature.

In the first monthly exams in this new school the boy fails his computer test. He cries. From always scoring a 95+ score, he had fallen to the bottom of the class. Dejected but resolute, with the support of his parents the boy starts working upon his weak areas. He read English newspapers aloud when he was alone, had long discussions with his father on history, geography and civics, worked extra hard on his weak subjects. Science and maths were easy. He used to mug up full pages of history lessons because he could not read or write English; on the other hand his classmates just sailed through easily. He hated his new school. He hated his parents. He hated everybody. But the boy had an unwavering spirit whose dreams were not limited. Within one year, the things had completely changed. The lad was now the topper of his class. Nothing succeeds like success; he excelled in academics, won essay competitions, learned calligraphy and painting, represented his school in debates, even got suspended for asking too many questions, gave speeches, joined the disciplinary committee, became class captain, shone in quizzes, volunteered for numerous activities, took part in singing and dancing events, toured Europe and most important of all got the affection of his peers and teachers. He felt good. And for the first time in his life, he felt special!

Of course he was a small kid who was learning many things and making many mistakes. In the journey he got hurt by some and hurt some. Sometimes boisterously mocked his friends and laughed upon them, sometimes had a fight, sometimes helped someone. Envy, love, hate, admiration and fear are few of the countless emotions he experienced. To err is human, and the boy was no different. But the positives he earned in these school days became his lessons for  life. With many ups and downs, the boy completed his schooling.

And well, in case you haven’t guessed it yet, that boy is me!

I am still waging the war which was started long ago from that kindergarten school - to mark my place in this competitive world. I am still a ‘nobody’, wanting to be a ‘somebody’. But while looking back I now realize that things that mattered the most then, were actually the least important of the lot. To me everything looks so small, so fickle at this moment. At the dusk of my life while introspecting will I see things in a similar manner? Everything insignificant? Fickle? I often wonder.

यारी

हसीं इतनी भी होगी, ख्वाब सी ये ज़िन्दगी
हमसफ़र आयेंगे इतने प्यारे.. कब सोचा था

वादी में बहती नदी, और खिले फूल
ऐसा मदमस्त समां होगा.. कब सोचा था

ठंडी चांदनी में नहाते हुए, झूमते हुए
रातें कटेंगी बातों में.. कब सोचा था

फिर बिछड़ जायेंगे यूँ ही, एक दम से
अंजाम-ए-यारी होंगे फासले इतने.. कब सोचा था

कश्ती

कश्ती सा तू
बहती नदिया सा जीवन
थमना नहीं तेरा मुक़द्दर
मिलना है तुझे एक दिन
उसमें जो है अथाह समुन्दर
बहता चल.. तू बहता चल

और कश्तियाँ मिलेंगी
रिश्ते जुड़ेंगे बातें बनेंगी
कुछ पल का साथ होगा
समाप्त होने के लिए सब एक दिन
कि दरिया मंज़िल होगा
कहता चल.. तू कहता चल

रुकना नहीं थमना नहीं
एक जगह तू जमना नहीं
नियति तेरी ले जायेगी उसमें
वो जो है अथाह समुन्दर
बहता चल.. तू बहता चल

कोई लौटा दे

वो बचपन के ज़माने
जब बड़े सयाने

डांटा करते
हम रोया करते

गुस्से में फूल
फिर सब भूल

लुका छुपी खेलते
माँ की गोद में छुपते

स्कूल में टीचर
अजीब क्रियेचर

मस्ती और पढ़ाई
मज़ाक में लड़ाई

फिर मैदान में
क्रिकेट या पकड़म पकड़ाई

शाम झट बीत जाती
घर आके, टीवी चलाते

पापा ऑफिस से आते
टीवी बंद हम भाग जाते

होमेवर्क को खोल
करते झोल

थोडा पढ़ते
ड्राइंग करते

लेते शावर
फिर डिज़्नी आवर

रात को दूध देख
अजीब चेहरे बनाते

कहानी बिना सोते नहीं
पापा डांट लगाते

माँ सुलाती
हम सो जाते..

फिर सपने में
बड़े होने के ख्वाब देखते
इस बात से अनजान
कि बड़े होकर हम
इसी बचपन को तरसेंगे...