कश्ती

कश्ती सा तू
बहती नदिया सा जीवन
थमना नहीं तेरा मुक़द्दर
मिलना है तुझे एक दिन
उसमें जो है अथाह समुन्दर
बहता चल.. तू बहता चल

और कश्तियाँ मिलेंगी
रिश्ते जुड़ेंगे बातें बनेंगी
कुछ पल का साथ होगा
समाप्त होने के लिए सब एक दिन
कि दरिया मंज़िल होगा
कहता चल.. तू कहता चल

रुकना नहीं थमना नहीं
एक जगह तू जमना नहीं
नियति तेरी ले जायेगी उसमें
वो जो है अथाह समुन्दर
बहता चल.. तू बहता चल

3 comments:

Raphael said...

deep, very deep....

sonal said...

nice poems :-)

Aditya ! said...

thanks.. :)