यारी

हसीं इतनी भी होगी, ख्वाब सी ये ज़िन्दगी
हमसफ़र आयेंगे इतने प्यारे.. कब सोचा था

वादी में बहती नदी, और खिले फूल
ऐसा मदमस्त समां होगा.. कब सोचा था

ठंडी चांदनी में नहाते हुए, झूमते हुए
रातें कटेंगी बातों में.. कब सोचा था

फिर बिछड़ जायेंगे यूँ ही, एक दम से
अंजाम-ए-यारी होंगे फासले इतने.. कब सोचा था

2 comments:

Raphael said...

too much fancy i say....missing the friends already..that's not a good sign...

Aditya ! said...

poetic exaggeration..that is!!