पूछिये कभी खुद से

This poem can be categorized under 'aiweyii writings'. This is the outcome when i listen to too much of Jagjit Singh and read too much of senti shayari stuff. 

Disclaimer : Heavy dose मजनू - छाप material ahead. Read at your own risk!:)

क्या कभी प्यार था ?
हमसे क्या खुद से पूछिये
जो इश्क़ परवान चढ़ा था कभी
उसकी बची हुई राख़ से पूछिये

जहां की बातों में न आना
ज़ालिम दुनिया है इससे क्या पूछिये
ये तो चाहते हैं कोई खुश न रहे
बातों बातों में बात क्या है पूछिये

जनाब हम झूठ बहुत बोलते हैं
ऐतबार टूट चूका है अब हमसे न पूछिये
खुद पर यकीं रहा हो तो ठीक
वरना छोड़िये अब क्या पूछिए :)

1 comment:

Raphael said...

cute and nice....lightly entertaining.....