सलीका

ख्वाब आँखों में कोरे थे जो
उनमें रंग तो कई भर लोगे
टिमटिमाते हुए लाखों हैं जो
आसमां से तारे वो चुन लोगे
जीत की चाह लिए चले थे
शिखर एक छू लोगे, कई छू लोगे
अपने अपने ढंग से जीते हैं सब
तुम भी जी लोगे

भूल न जाना बस अपने वजूद को
उस रकीब को, इस ज़मीर को

मिटटी से आया था
मिटटी में ही मिल जाएगा..
दे पाया मुस्कान किसी को
जीवन सफल बन जाएगा !!

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