एक

एक डगर थी
उसपे था राही एक
एक सफ़र बस
था साथी एक
एक काँटा था
चुभा तो दर्द एक
एक नगर आया
रात गुज़ारी एक
एक दिन ऊगा
फिर बढ़ा  कदम एक

एक डगर फिर थी
उसपे था वही राही एक
एक सपना बेचकर
ख़रीदा नया सपना एक

1 comment:

Misha said...

The lines in our hands keep changing... :)