साज़िश


वो चलती है जहां चलता है
पैरों तले उसके आसमां चलता है
रोती है वक़्त रुक जाता है
पैरों तले पड़ा आसमान तब वहीँ टिक जाता है

अदायें दिखाती वो
मटक मटक बलखाती वो
गिर जाती वो मुस्काती वो
आधे कुतरे हुए बिस्कुट को पकड़े
घर भर में ऊधम मचाती वो

वो हंसती है सूरज का धागा उससे जुड़ जाता है
वो गाती है कोयल का राग बेसुरा पड़ जाता है
नाचती है वो तो सृष्टी झूम उठती है
झूमती है वो तो माँ चूम उठती है
उदासी नहीं मालूम उसे
उबासी नहीं मालूम उसे
भूख नहीं पता चालाकी नहीं पता
होशयारी नहीं पता समझदारी नहीं पता
दुनिया के रीति रिवाजों से अनजान
बड़ी हो रही है वो नादान

उसे क्या मालूम ये दुनिया साज़िश में है
उसे भी इंसान बनाने की ..


4 comments:

Pranav R. Hundoo said...

kambhakt zamana na sa(n)waarne de bachpan k fasane sir...behtareen likha hai!!

Swati Patel said...

amazing... beautiful.. supersweetcute.. :) :) :)

Aditya ! said...

thnks hundoo.. ur first comment on my blog.. :)

@swat-cat, :)))

Misha said...

hey,
childhood is no doubt the beeeest tym of life...but growing up is also not that bad!
u can always still have that small child smwhere in ur heart...n never let him go!