रिश्ते

समंदर किनारे उस रोज़
रेत के टीले बना उगाये थे रिश्ते
बह गए तो बह जाने दो

टूट कर कब तक बिखरते रहोगे
बहुत हो चुका ये सिलसिला
इसे थमना है, थम जाने दो

एक रंग

तुम हो एक रंग
एक रंग हूँ मैं
ज़िन्दगी के कैनवास पर
चलो पेंटिंग बनाते हैं
लकीरें खीच दी हैं
ऊपर वाले ने पहले से
बस रंग भरना बाकी है
एक रंग से लेकिन
रंगती नहीं तस्वीर कोई
इसलिए
आओ दोनों मिल जाएँ
ज़िन्दगी को मुकम्मल बनाएं.

अजीब बला

सोता है
जागता नहीं

हांफता है
रुकता नहीं

कोसता है
देखता नहीं

मरता है
जीता नहीं

जाता है
आता नहीं,

अजीब बला है ये - 'आदमी'

सारी ज़िन्दगी सोता है
जागता नहीं आदमी

भागते भागते हांफता है
रुकता नहीं आदमी

दुनिया को कोसता है
देखता नहीं आदमी

सारी उम्र मरता है
जीता नहीं आदमी

एक बार जब चला जाता है
आता नहीं आदमी.
आदमी बचता नहीं आदमी.

Random Bakvaas - about this BLOG



This is a kind of post which i should have written on my blog's anniversary or some made up occasion like that, but here i am, just blabbering out certain things. 

Let me start with this. Why do i keep changing the look of this blog? Beauty pleases everyone, and i don't want to be an exception here :-) Therefore i keep trying different themes. I personally like bright vibrant themes with white background for the text, it enhances the readability - i think.

About the blog title and subtitle. FYI(For Your Information) "ये जीना भी कोई जीना है लल्लू !" is a line from a song(from Amitabh Bachchan's movie Mr. Natwarlal). In the beginning the blog had a different name which i can't even remember now. Once i tried this title, i fell in love with it. And NOW this particular line gives identity to the blog :-). About the subtitle - "Better to write for yourself and have no public, than to write for the public and have no self." -  it is a quote by Cyril Connolly. I added this particular line to my blog in September 2009. Why? Because i loved it. Because i (try to) follow it on my blog. Simple.

Now that "ये जीना भी कोई जीना है लल्लू !" is getting some readers, i'm happy that i've some critics too. Almost everything on this blog is written by yours-truly :D and it is very obvious that you cannot like everything i write. There are many readers(mostly friends) who come here and don't comment on the posts. It is  a humble request that please DO COMMENT on anything you like(you can leave quietly if you don't like something...shhhhh ;-). BTW, I love to have discussions. 

That's all i guess. Please keep reading and keep commenting. No matter how much i lay stress upon the fact that i write for myself, it still requires some motivation to CARRY ON :D

ये जो रात है


ये रात न गुज़रेगी
इतनी आसानी से
अभी तो चाँद पूरा पका भी नहीं
अभी कच्ची सांसें लेता कोई 
तारा टूटा भी नहीं
सोये नहीं कुछ लोग अभी
बस्ती शांत है,
शांत हैं रास्ते,
लेकिन अभी तो सिर्फ शुरुआत है
रात अभी जवान हो रही है
ढलेगी नहीं इतनी आसानी से


अभी तो कई सपने देखने हैं
रंग बिरंगे.. सपनो में सपने..
हसीं खुशनुमा मुस्कुराते सपने
रात की सवारी करेंगे आज ये
अभी नहीं ख़त्म हुआ तमाशा
अभी तो शुरुआत है
अभी बहुत बाकी है मेरे दोस्त
ये तन्हाई की रात है..
ज़िन्दगी को तारे के साथ तोड़कर खा जाएगी
ये जो बेहद लम्बी रात है
गुज़रेगी नहीं इतनी आसानी से
अंत की अभी शुरुआत है
ये जो रात है ..

वक़्त अक्सर रुक जाता है तुम्हारे बिना ..
तुम्हारे बिना रुक गयी ये रात है ..

Dedicated to creativity



Nothing Is original. Steal from anywhere that resonates with inspiration or fuels your imagination. Devour old films, new films, photographs, poems, dreams, random conversatlons, architecture, bridges, street signs, trees, clouds, bodies of water, light and shadows. Select only things to steal from that speak directly to your soul. If you do this, your work (and theft) will be authentic. Authenticity Is invaluable; originality is non-existent. And don’t bother concealing your thievery—celebrate it if you feel like it. In any case, always remember what Jean-Luc Godard said:"It is not where you take things from - it's where you take them to."

एक और किस्सा ..

सोचा हमने.. राह में पड़ी राख को देखकर
जाने किसने कल अपनी यादें जलाईं हैं?


बारिश में भीग गया चाँद तक
जाने किसने रो रोकर अपनी आँखें सुजाईं हैं?


भीड़ में गहराती खामोशी सुनाई दी है
जाने किसने कल अपनी सारी आवाजें गंवाई हैं?


बस्ती ग़मज़दा आशियाने उजड़े से दिखते हैं
जाने किसने इतनी दौलतें लुटाई हैं?


सोचा हमने राह में पड़ी राख को देखकर
जाने किसने.. अपनी यादें जलाईं हैं?