एक और किस्सा ..

सोचा हमने.. राह में पड़ी राख को देखकर
जाने किसने कल अपनी यादें जलाईं हैं?


बारिश में भीग गया चाँद तक
जाने किसने रो रोकर अपनी आँखें सुजाईं हैं?


भीड़ में गहराती खामोशी सुनाई दी है
जाने किसने कल अपनी सारी आवाजें गंवाई हैं?


बस्ती ग़मज़दा आशियाने उजड़े से दिखते हैं
जाने किसने इतनी दौलतें लुटाई हैं?


सोचा हमने राह में पड़ी राख को देखकर
जाने किसने.. अपनी यादें जलाईं हैं?

1 comment:

Dushyant said...

No words for this. Just love it...