अजीब बला

सोता है
जागता नहीं

हांफता है
रुकता नहीं

कोसता है
देखता नहीं

मरता है
जीता नहीं

जाता है
आता नहीं,

अजीब बला है ये - 'आदमी'

सारी ज़िन्दगी सोता है
जागता नहीं आदमी

भागते भागते हांफता है
रुकता नहीं आदमी

दुनिया को कोसता है
देखता नहीं आदमी

सारी उम्र मरता है
जीता नहीं आदमी

एक बार जब चला जाता है
आता नहीं आदमी.
आदमी बचता नहीं आदमी.

3 comments:

swati said...

i like d way its written.. nice..:)

Misha said...

i realise ur poetry is gaining more depth....
i generally hv to read ur peoms twiceor thrice to get the deeper meaning..
so..going gr8! :))

Aadii said...

I doubt about the depth :) :)