पिटारा पोएम्स का - 3



These poems were written as FB status messages(that's why no poem's longer than 420 characters) during my Infy training. Blogger was blocked back then so publishing them now.



Dil mein thodi awargi rakhna, 
Zehen mein thodi saadgi rakhna, 
Rakhna aankhon mein sapne dher saare, 
Aur jab hunsna .. Dil khol ke hunsna.





Beh jaaye jo bina liye kuch
aankhon se wo pani kaisa ..





Ya rabb
mil kisi roz
chai piyenge nukkad pe
aur gupshup karenge
kuch kisse tu sunana
kuch hum kahenge


Yahan wahan ki
saare jahaan ki
kya 'happening' teri 'life' mein
kya meri 'life' mein
kuch 'gossip' tu batana
kuch hum kahenge


Ya rabb
mil kisi roz
Arsaa hua dil khol baatein kiye huye . .







Sahi bhi,
Aur nahin bhi.


Dard bhi,
Aur dawa bhi.


Shor bhi,
Aur khamoshi bhi.


Apne bhi,
Aur paraye bhi.


Tum.





Roshni odh ke chalte hain,
Sab rangon mein dhalte hain,
Kabhi badlon se ja milte hain,
Kabhi phoolon sa khilte hain ..


Duniya ke dastur nirale hain,
Ratein safed, din kaale hain,
Rooh ka kahin nishaan nahin,
Awazon pe pad gye taale hain ..


Isliye to..


Muskurahat baant te firte hain,
Girte hain, Sambhalte hain,
Khud ke andheron se ladte hain,
Aur Roshni Odh ke.. Chalte hain ..





Apne sapno ko udaan de de,
Sard zamin ko aasmaan de de,
Rishton ki dor mein ulajha har koi,
Thehar zara inhe aaram de de ..





Kitne aashiyane ujaade waqt ne,
Kitne banaye,
Pagal hai saala ye,
Bolo kaun ise samjhaye?





Ab kis se door rahein,
Kiske kareeb jaayein..
Itne kareeb bhi na hon,
Ki faasle ho jaayein..





Ek aise jahan ki talaash hai,
Jahan mutthi me akash hai..


Jahan zehen safed,
aur arman rangin hain,
Waqt ki dhun pe nachti,
Zindagi hasin hai.


Jahan rishte to hain,
par samjhaute nahin,
Jahan chehron pe,
Mukhoute nahin.


Ek aise jahan ki talaash hai,
Milta nahi lekin,
Jawab mein sirf ek lavz -- "Kaash!" hai ..





Yeh safar bhi ajeeb hai,
Bada ajeeb ye mela hai,
Yahan har rooh pyaasi,
Har shaqs akela hai..


Meelon faili raat hi raat,
Na jaane kahan savera hai,
Yahaan har taraf hai khamoshi,
Har taraf ghana andhera hai ..





Lecture bunk,
Tuck ki chaai,
Dinbhar masti,
Hosh udaay..


Mall pe chakkar,
Dhaba paratha,
Class mein proxy,
Roz tamasha..


Beete din wo,
Guzre pal,
Mehakta hua sa,
Tha wo kal..


Kuch rishte zinda bache hain..
Kuch yaadein dhundli ho rahi hain..



P.S. "पिटारा पोएम्स का - 1" can be read from here :)
P.S. "पिटारा पोएम्स का - 2" can be read from here :)

दादी की कहानी



'दादी दादी कहानी सुनाओ न..प्लीज़ दादी', चुनमुन ज़िद करते हुए बोला. उसकी दादी सब दादियों की तरह बूढी थी, बहुत बूढी. सफ़ेद बाल, बिना दांतों का पोपला मुंह, आखों पे मोटा चश्मा, अमिताभ बच्चन की फिल्मों से लेकर सास बहू के सीरियल तक - दादी सब देखती थी. और दादी को घर में सब प्यार करते थे क्यूंकि घर में सबको डांट लगाने वाले पापा को डांट सिर्फ दादी लगा सकती थी.  'अरे बेटा मुझे कहाँ कहानी आती है..और तुझे अब फिर से कहानियों का भूत सवार हो गया..', दादी ने जवाब दिया. चुनमुन अपनी दादी के साथ ही सोता था. 'भूत!! कहाँ??', चुनमुन घबरा कर उठ बैठा. 'अरे सोजा सोजा, मैं तो ऐसे ही कह रही थी.. भूत यहाँ शहर में नहीं होता.. गाँव में होता है..', दादी ने उसे वापिस सुला लिया अपने पास ऐसा कहकर. 'दादी सुनाओ न कहानी, मेरे सब दोस्तों की दादियाँ कहानी सुनाती हैं.. सब स्कूल में सुनाते हैं.. मेरे पास कुछ नहीं होता.. सुनाओ न कहानी दादी...', चुनमुन अब मचलने लगा था. वैसे था वो 4th क्लास में लेकिन दादी का कुछ ज़्यादा ही लाडला होने की वजह से और बच्चा बन जाता था. दादी पढ़ी लिखी नहीं थी, रामायण और महाभारत की कहानियाँ आती थी तो वो चुनमुन सुन चुका था. 

'अच्छा हातिमताई की कहानी सुनेगा?'
'क्या दादी..'
'ह्म्म्म..तो शेखचिल्ली की कहानी?'
'क्या दादी..'
'तो वो लकड़हारे वाली?'
'क्या दादी..'
'तो मुझे नहीं आती और कोई कहानी, चल सोजा..'
'दादी नहीं.. दादी अच्छा वो लकडहारे वाली कहानी ही सुना दो..!'

दादी की कहानी शुरू होने वाली ही थी की बाजू वाले कमरे से पापा की आवाज़ आई... 'चुनमुन. सो जाओ जल्दी, सुबह उठते नहीं हो फिर!' इतना सुनना था की चुनमुन रजाई में दुबक गया और धीरे से बोला, 'दादी बोलो न पापा को कि मैं सो गया ..दादी प्लीज़!' दादी ने अपनी बूढी आवाज़ में चिल्लाया, 'छोटू.. चुनमुन तो कबका सो गया..' पापा को पता था कि दादी झूठ बोल रही थी, दादी को पता था कि पापा को पता है .. ये रोज़ की बात थी.. इसलिए तो दादी चुनमुन कि फेवरेट थी. 

'दादी....कहानी?'

'हाँ हाँ.. सुना रही हूँ..... एक समय कि बात है.. एक गाँव में एक गरीब लकड़हारा रहता था.. वो जंगल जाता था लकडियाँ काटने.. बेचारा बहुत गरीब था.. रोज़ लकड़ियाँ काट कर लाता और शाम को बाज़ार में बेच देता.. उस से जो कुछ पैसे मिलते, उससे चने का आटा लेकर आता और रोटी बनाकर नमक के साथ खा लेता..  तो एक दिन वो ऐसे ही जंगल गया.. बेचारा बहुत गरीब था.. '

'दादी कितनी बार बताओगी.. मैं समझ गया वो गरीब था..'

'अच्छा बाबा ठीक है.. तो कहाँ थी मैं? ... हाँ.. याद आया.. तो एक दिन वो बेचारा गरीब लकड़हारा जंगल गया.. लकड़ी काटते काटते उस दिन उसकी कुल्हाड़ी टूट गयी.. अब उसने तो रोना शुरू कर दिया.. गरीब था न बेचारा.. तो क्या हुआ फिर.. अम्म...क्या हुआ फिर? ', दादी सोचने लगी.

'अरे दादी फिर वो जंगल कि देवी आई न कुल्हाड़ी लेकर..', चुनमुन ने कहानी तो सुन ही राखी थी, तो उसने पटाक से याद दिलाया.
'अरे हाँ हाँ.. तो जंगल कि देवी आई.. चांदी कि कुल्हाड़ी लेकर.. कुल्हाड़ी देखकर लकड़हारा बोला कि ये मेरी कुल्हाड़ी नहीं है.. मेरी तो लकड़ी की थी.. देवी उसकी इमानदारी देखकर बहुत प्रसन्न हुई.. जय देवी मां.......'

'दादी.. कहानी?'

'हाँ.. हाँ.. तो कहाँ थी मैं? देवी माँ बहुत प्रसन्न हुई.. तो उन्होंने उस बेचारे गरीब को अगली बार एक सोने कि कुल्हाड़ी लाकर दी.. लेकिन उसने वो भी लेने से मना कर दिया..........'

'दादी... दादी.. चुप क्यूँ हो गयी?'

'हाँ.. हाँ...सोचने तो दे.. फिर उसने वो कुल्हाड़ी लेने से भी मना कर दिया..कहा कि ये मेरी नहीं है..मुझे तो मेरी लकड़ी कि कुल्हाड़ी ही चाहिए.. तो देवी माँ बहुत प्रसन्न हुई..तो उन्होंने कहा.........'

'क्या कहा दादी?' चुनमुन ने यूँ ही पूछ लिया. 

'अरे... क्या कहा... याद नहीं आ रहा....' 

'तो उन्होंने लकड़ी कि कुल्हाड़ी लाकर दी उसे और चांदी के..', चुनमुन ने दादी को याद दिलाया.

'हाँ हाँ.. चांदी के सिक्के दिए ढेर सारे और कहा कि .............'

'दादी? दादी? उठो?'


और बेचारी दादी कि नींद लग गयी कहानी सुनाते सुनाते. 

चंद शब्द



आज आखिर वक़्त मिला तो
सोचा चंद शब्द लिख लूं

बयां हो पाए शायद दिल का हाल
तौल पाऊं शायद ये खालीपन
कसक सी रहती है जो हरदम
जो कहना चाहता हूँ हमेशा
बिना बातों की बातें
करवट बदलते जो काटी हैं रातें
ये सूनापन ये ख़ामोशी
शायद लिख पाऊं ..

आज आखिर वक़्त मिला तो
सोचा चंद शब्द लिख लूं
कुछ फ़साने बयां कर पाना लेकिन
मुमकिन नहीं होता..

Long Lost Love

I have always believed that what you truly love will reach out to you, come what may! Now whether you deserve it or not, is a different matter altogether.

Few years ago we met, and I fell in love. Yes, I was the idiot to fall for the trap (no not crap, trap!) called 'love'. I don’t know how or why or even when, yet somehow I knew I was in love. And I would have never known this, if it wasn’t for that moment which separated us. One bloody moment that was!

Circumstances had turned out such that we could no longer be together. Absence makes you realize someone’s real worth – that’s exactly what happened to me. I got to know new definitions of love, each one more profound than the previous one. Cravings became deeper as days passed. I tried everything I could but life is a river which moves at a ferocious pace, you just cannot remain glued to anything. Yes, you can flow together if you find a glue powerful enough to hold you as one. Okey, okey! coming back to the point. So here I was, all sad and gloomy. Trying with all my might........ but lost love cannot be wooed back easily. Days had become dull, and nights were murkier. It felt as if every sad song was created for me. Frustration kept growing, there was so much to say but I felt like if I had lost my voice, my soul!

Then one day it happened, and I can tell you the sun was brighter that day, air felt scented, i could relate to all the happy songs now, my black’n white life had become colorful for I had found my voice back, my expression, my passion back. I had found………………… MY blog back :)

Yes, the love in this post is that for this blog. I had to stay away from blogging for some 6 months because of Infy training. But, I’m BACK now. I hope i can bug you folks with more vigor and ferocity.
Wish me luck. Amen!