दादी की कहानी



'दादी दादी कहानी सुनाओ न..प्लीज़ दादी', चुनमुन ज़िद करते हुए बोला. उसकी दादी सब दादियों की तरह बूढी थी, बहुत बूढी. सफ़ेद बाल, बिना दांतों का पोपला मुंह, आखों पे मोटा चश्मा, अमिताभ बच्चन की फिल्मों से लेकर सास बहू के सीरियल तक - दादी सब देखती थी. और दादी को घर में सब प्यार करते थे क्यूंकि घर में सबको डांट लगाने वाले पापा को डांट सिर्फ दादी लगा सकती थी.  'अरे बेटा मुझे कहाँ कहानी आती है..और तुझे अब फिर से कहानियों का भूत सवार हो गया..', दादी ने जवाब दिया. चुनमुन अपनी दादी के साथ ही सोता था. 'भूत!! कहाँ??', चुनमुन घबरा कर उठ बैठा. 'अरे सोजा सोजा, मैं तो ऐसे ही कह रही थी.. भूत यहाँ शहर में नहीं होता.. गाँव में होता है..', दादी ने उसे वापिस सुला लिया अपने पास ऐसा कहकर. 'दादी सुनाओ न कहानी, मेरे सब दोस्तों की दादियाँ कहानी सुनाती हैं.. सब स्कूल में सुनाते हैं.. मेरे पास कुछ नहीं होता.. सुनाओ न कहानी दादी...', चुनमुन अब मचलने लगा था. वैसे था वो 4th क्लास में लेकिन दादी का कुछ ज़्यादा ही लाडला होने की वजह से और बच्चा बन जाता था. दादी पढ़ी लिखी नहीं थी, रामायण और महाभारत की कहानियाँ आती थी तो वो चुनमुन सुन चुका था. 

'अच्छा हातिमताई की कहानी सुनेगा?'
'क्या दादी..'
'ह्म्म्म..तो शेखचिल्ली की कहानी?'
'क्या दादी..'
'तो वो लकड़हारे वाली?'
'क्या दादी..'
'तो मुझे नहीं आती और कोई कहानी, चल सोजा..'
'दादी नहीं.. दादी अच्छा वो लकडहारे वाली कहानी ही सुना दो..!'

दादी की कहानी शुरू होने वाली ही थी की बाजू वाले कमरे से पापा की आवाज़ आई... 'चुनमुन. सो जाओ जल्दी, सुबह उठते नहीं हो फिर!' इतना सुनना था की चुनमुन रजाई में दुबक गया और धीरे से बोला, 'दादी बोलो न पापा को कि मैं सो गया ..दादी प्लीज़!' दादी ने अपनी बूढी आवाज़ में चिल्लाया, 'छोटू.. चुनमुन तो कबका सो गया..' पापा को पता था कि दादी झूठ बोल रही थी, दादी को पता था कि पापा को पता है .. ये रोज़ की बात थी.. इसलिए तो दादी चुनमुन कि फेवरेट थी. 

'दादी....कहानी?'

'हाँ हाँ.. सुना रही हूँ..... एक समय कि बात है.. एक गाँव में एक गरीब लकड़हारा रहता था.. वो जंगल जाता था लकडियाँ काटने.. बेचारा बहुत गरीब था.. रोज़ लकड़ियाँ काट कर लाता और शाम को बाज़ार में बेच देता.. उस से जो कुछ पैसे मिलते, उससे चने का आटा लेकर आता और रोटी बनाकर नमक के साथ खा लेता..  तो एक दिन वो ऐसे ही जंगल गया.. बेचारा बहुत गरीब था.. '

'दादी कितनी बार बताओगी.. मैं समझ गया वो गरीब था..'

'अच्छा बाबा ठीक है.. तो कहाँ थी मैं? ... हाँ.. याद आया.. तो एक दिन वो बेचारा गरीब लकड़हारा जंगल गया.. लकड़ी काटते काटते उस दिन उसकी कुल्हाड़ी टूट गयी.. अब उसने तो रोना शुरू कर दिया.. गरीब था न बेचारा.. तो क्या हुआ फिर.. अम्म...क्या हुआ फिर? ', दादी सोचने लगी.

'अरे दादी फिर वो जंगल कि देवी आई न कुल्हाड़ी लेकर..', चुनमुन ने कहानी तो सुन ही राखी थी, तो उसने पटाक से याद दिलाया.
'अरे हाँ हाँ.. तो जंगल कि देवी आई.. चांदी कि कुल्हाड़ी लेकर.. कुल्हाड़ी देखकर लकड़हारा बोला कि ये मेरी कुल्हाड़ी नहीं है.. मेरी तो लकड़ी की थी.. देवी उसकी इमानदारी देखकर बहुत प्रसन्न हुई.. जय देवी मां.......'

'दादी.. कहानी?'

'हाँ.. हाँ.. तो कहाँ थी मैं? देवी माँ बहुत प्रसन्न हुई.. तो उन्होंने उस बेचारे गरीब को अगली बार एक सोने कि कुल्हाड़ी लाकर दी.. लेकिन उसने वो भी लेने से मना कर दिया..........'

'दादी... दादी.. चुप क्यूँ हो गयी?'

'हाँ.. हाँ...सोचने तो दे.. फिर उसने वो कुल्हाड़ी लेने से भी मना कर दिया..कहा कि ये मेरी नहीं है..मुझे तो मेरी लकड़ी कि कुल्हाड़ी ही चाहिए.. तो देवी माँ बहुत प्रसन्न हुई..तो उन्होंने कहा.........'

'क्या कहा दादी?' चुनमुन ने यूँ ही पूछ लिया. 

'अरे... क्या कहा... याद नहीं आ रहा....' 

'तो उन्होंने लकड़ी कि कुल्हाड़ी लाकर दी उसे और चांदी के..', चुनमुन ने दादी को याद दिलाया.

'हाँ हाँ.. चांदी के सिक्के दिए ढेर सारे और कहा कि .............'

'दादी? दादी? उठो?'


और बेचारी दादी कि नींद लग गयी कहानी सुनाते सुनाते. 

2 comments:

DHEER said...

ha ha ha !

'आदी? आदी? आदी? उठो?'

और 'आदी' कि नींद लग गयी कहानी सुनाते सुनाते. !! :D

Aha!DITYA said...

:)