चेहरे



तुम कभी अपने चेहरे से
चेहरे हटाकर देखना
कई रंग, कई मौसम नज़र आयेंगे
एक नहीं, दो नहीं, सौ लोग नज़र आयेंगे
पुरानी बातें, वही कहानियाँ
दबे हुए ज़ख्म
अधूरे प्यार
हसीं लम्हे
धोखे खाई पथराई आँखें
एहसानों तले दबी सांसें
तजुर्बे से पड़ी चंद लकीरें
सब नज़र आयेंगे, देखना.

तुम कभी अपने चेहरे से
चेहरे हटाकर देखना
शायद किसी कोने में सहमी सी बैठी
मासूमियत नज़र आ जाए.

छींटे मॉनसून के



सुबह सुबह जब बारिश में नहाया सूरज
बादलों में से अंगड़ाई ले
जब चमकते हॉकी के टर्फ से लगते
गीले लॉन पर हीरे खिलें
जब ठंडी नमी भरी पैनी हवा
ज़हन को सांस दे
तब लगता है कि मॉनसून आ गया..


जब न्यूज़ पेपर गीला हाथ लगे
और ऐहतियात से पलट पलट पढ़ना पड़े
जब अदरक वाली चाय तो हो कड़क गरम
लेकिन बेचारा बिस्कुट हो जाए एकदम नरम
जब इमली की चटनी हौले से
पकोड़ों पर बहती चली जाए
तब लगता है कि मॉनसून आ गया..


जब धूप खेले दिन भर आँख मिचोली
बैट-बॉल ले निकले बच्चों की टोली
जब एकदम से कभी बरखा बौछार आये
और माँ छत पर सूखते कपडे उठाने दौड़ी आये
जब भुट्टों की महक से सजे ठेले
अक्सर ही मन को ललचायें
तब लगता है कि मॉनसून आ गया..


जब रिश्तों के नाज़ुक धागे
वक़्त के थपेड़ों से डोलने लगें
जब सारे अपने, पराये हो जाएँ
सुकून नीलाम हो, खुशियाँ बिक जाएँ
और जब ऐसे किस्मत के खेल में
एक साथ, हाथ बन सहारा दे
जब उस फ़रिश्ते से खुदा की रहमत
नूर बन बरसे
जब आँखें हो जाएँ बेज़ुबान
और आंसू बोलने लगें
तब.. और तब लगता है कि मॉनसून आ गया..