छींटे मॉनसून के



सुबह सुबह जब बारिश में नहाया सूरज
बादलों में से अंगड़ाई ले
जब चमकते हॉकी के टर्फ से लगते
गीले लॉन पर हीरे खिलें
जब ठंडी नमी भरी पैनी हवा
ज़हन को सांस दे
तब लगता है कि मॉनसून आ गया..


जब न्यूज़ पेपर गीला हाथ लगे
और ऐहतियात से पलट पलट पढ़ना पड़े
जब अदरक वाली चाय तो हो कड़क गरम
लेकिन बेचारा बिस्कुट हो जाए एकदम नरम
जब इमली की चटनी हौले से
पकोड़ों पर बहती चली जाए
तब लगता है कि मॉनसून आ गया..


जब धूप खेले दिन भर आँख मिचोली
बैट-बॉल ले निकले बच्चों की टोली
जब एकदम से कभी बरखा बौछार आये
और माँ छत पर सूखते कपडे उठाने दौड़ी आये
जब भुट्टों की महक से सजे ठेले
अक्सर ही मन को ललचायें
तब लगता है कि मॉनसून आ गया..


जब रिश्तों के नाज़ुक धागे
वक़्त के थपेड़ों से डोलने लगें
जब सारे अपने, पराये हो जाएँ
सुकून नीलाम हो, खुशियाँ बिक जाएँ
और जब ऐसे किस्मत के खेल में
एक साथ, हाथ बन सहारा दे
जब उस फ़रिश्ते से खुदा की रहमत
नूर बन बरसे
जब आँखें हो जाएँ बेज़ुबान
और आंसू बोलने लगें
तब.. और तब लगता है कि मॉनसून आ गया..

2 comments:

Misha said...

loved the 2nd and 3rd paragraphs... :)
i was actually missing monsoon (my fav time of the year)...

Aadii said...

:)