चेहरे



तुम कभी अपने चेहरे से
चेहरे हटाकर देखना
कई रंग, कई मौसम नज़र आयेंगे
एक नहीं, दो नहीं, सौ लोग नज़र आयेंगे
पुरानी बातें, वही कहानियाँ
दबे हुए ज़ख्म
अधूरे प्यार
हसीं लम्हे
धोखे खाई पथराई आँखें
एहसानों तले दबी सांसें
तजुर्बे से पड़ी चंद लकीरें
सब नज़र आयेंगे, देखना.

तुम कभी अपने चेहरे से
चेहरे हटाकर देखना
शायद किसी कोने में सहमी सी बैठी
मासूमियत नज़र आ जाए.

4 comments:

Anonymous said...

Sooo true! Really nice :)

Aadii said...

:)

Punkster said...

Okay sir.
After this, I'm a fan of yours.

Aadii said...

Pleasure is mine :)
Thank you.