Hey, Wassup?

कुछ दिनों में Jokes फीके पड़ गये
Cute हरकतें Cheesy हो गयीं
ग़लतफ़हमियाँ पनपी
झगड़े लाज़मी हो गये
कुछ दिनों में बदलते बदलते
बहुत कुछ बदल गया

Priorities बदलीं, बदली पसंद
बदले दोस्त, बदले ढंग
नए लोग मिले पुराने छूटे
नए हुए Exciting पुराने पड़ गए फीके
बदल गए अंदाज़-ए-यारी
Juices छूटे आई Tequila की बारी 
भूले सादगी सीखी होशियारी
सीखे Excuses और नए झूठ
दिल बदला दिमाग बदला 
रूह सह न सकी ऐसा लिबास बदला 
कुछ दिनों में बदलते बदलते
बहुत कुछ बदल गया

नहीं बदला तो वो यादों का Collection
जो वक़्त के साथ धुंधलाता तो गया
लेकिन ज़हन में साँस जैसे घुलता रहा
वो एहसासों का काफिला
जो कभी किसी गाने किसी Movie के साथ
कभी किसी जगह किसी बात के साथ
कभी ऐसे ही, कभी बरसात के साथ 
आँखों के सामने चला आता है 
आज भी !

वैसे वक़्त तो मरने का भी नहीं आजकल
लेकिन कभी पुराने 'मैं' से मिलो
और नज़रें मिला पाओ 
तो 'Hey, Wassup?' ज़रूर कह देना !

दर्द



दर्द घुला है हवा में
छुपा हैं कहीं, यहीं
आँखों की नमीं के पीछे से
आँसू बन बहता नहीं
बेज़ुबान कुछ कहता नहीं

हंसो कभी तो दिखाई देता है
एक चेहरा अक्सर सुनाई देता है
खुरदुरे गर्म हाथों का एहसास
पैनी चीरती नज़र का एहसास
एक आवाज़ जो अटक गयी है हलक में
और साँस.. जो फैल गयी है फलक में
नर्म उजले सवेरों की तलाश है
अब तो बस खाली.. खाली आकाश है
शायद ये ही दर्द का एहसास है
दर्द.. घुला है हवा में
छुपा है कहीं, यहीं

राहें जो सीधी दिखाई पड़ती थीं
ज़िंदगी को साथ ले एकदम से मुड़ गयीं
कुछ तकदीरों का साथ छूटा
कुछ यूँ ही जुड़ गयीं
यादें साथ हैं बस
बातें रुकी नहीं, बहती गयीं
टूटे तारों के सामने आँचल फैलाए
आँखें अब सुर्ख लाल हुईं
कुछ महसूस नहीं होता अब
कम्बख्त घुला है हवा में
छुपा है कहीं, यहीं

दम निकले तो जान आए.

यूँ भी तो करो



यूँ भी करो बैठे बैठे कभी
कि तुम सोचो ना कुछ
बोलो ना कुछ
रहो ना कुछ

आसमां में मिल जाओ नीले रंग की तरह
उड़ जाओ टूटी हुई पतंग की तरह 
पंछियों से होड़ लगाओ
उठो, उड़ो, परवाज़ जगाओ
ये क्या तुम थके थके से रहते हो
यूँ ही सबसे कटे कटे से रहते हो
आँखों में पानी जलाते
अनकही कहते हो
भीड़ में यूँ बहते हो
क्यूँ इतना सब सहते हो
आओ, बैठो
सोचो ना कुछ
बोलो ना कुछ
रहो ना कुछ

देखो ये ध्यान मग्न आसमां
ये नदियाँ, ये फ़िज़ायें, ये दास्तान
बातें करती तितलियाँ
गोते लगाती, चिढ़ाती, मछलियाँ 
ये बूढ़े पेड़, जो जवान है अब तक
परिंदों के घरोंदे बसे इन पर 
नर्म घास का ये फर्श
तुम्हे बुलाता, हाथ बढ़ाता, अर्श
ज़हन को साँस देती हवा
कितना कुछ है यहाँ 
बस नज़र नज़र का खेल है
आँखें बंद करो तो सब कुछ है
वरना जीवन जेल है 
थोड़ी तो फुरसत निकालो 
बैठो
सोचो ना कुछ
बोलो ना कुछ
रहो ना कुछ
यूँ भी तो करो कभी. 

अच्छा लगेगा.

बादल



धूप छानते उमड़ रहे हैं ये जो बादल 
आसमां पर काजल सा लगाते कभी 
कभी सूरज का घूंघट बन जाते
इतराते हुए ये मंडराते 
बड़ा नाज़ है इन्हें खुद पर
नीले आसमां को सफेदिया रंगते 
और कभी सूरज से गुस्सा हो लाल पड़ जाते 
सतरंगी इन्द्रधनुष का बसेरा हैं ये 
मुट्ठी में लेना चाहो तो ख्वाब हो जाते
थामना मुमकिन नहीं इन्हें 
ढेरों उम्मीदों का बोझ लिए
खुद को मिटाकर इन्हें
आखिर एक दिन बरसना भी तो है ..