बादल



धूप छानते उमड़ रहे हैं ये जो बादल 
आसमां पर काजल सा लगाते कभी 
कभी सूरज का घूंघट बन जाते
इतराते हुए ये मंडराते 
बड़ा नाज़ है इन्हें खुद पर
नीले आसमां को सफेदिया रंगते 
और कभी सूरज से गुस्सा हो लाल पड़ जाते 
सतरंगी इन्द्रधनुष का बसेरा हैं ये 
मुट्ठी में लेना चाहो तो ख्वाब हो जाते
थामना मुमकिन नहीं इन्हें 
ढेरों उम्मीदों का बोझ लिए
खुद को मिटाकर इन्हें
आखिर एक दिन बरसना भी तो है .. 

2 comments:

Misha said...

loong time dost... :)
loved the ending!

Punkster said...

I admire the perspective with which you look at things. It's just too beautiful.