यूँ भी तो करो



यूँ भी करो बैठे बैठे कभी
कि तुम सोचो ना कुछ
बोलो ना कुछ
रहो ना कुछ

आसमां में मिल जाओ नीले रंग की तरह
उड़ जाओ टूटी हुई पतंग की तरह 
पंछियों से होड़ लगाओ
उठो, उड़ो, परवाज़ जगाओ
ये क्या तुम थके थके से रहते हो
यूँ ही सबसे कटे कटे से रहते हो
आँखों में पानी जलाते
अनकही कहते हो
भीड़ में यूँ बहते हो
क्यूँ इतना सब सहते हो
आओ, बैठो
सोचो ना कुछ
बोलो ना कुछ
रहो ना कुछ

देखो ये ध्यान मग्न आसमां
ये नदियाँ, ये फ़िज़ायें, ये दास्तान
बातें करती तितलियाँ
गोते लगाती, चिढ़ाती, मछलियाँ 
ये बूढ़े पेड़, जो जवान है अब तक
परिंदों के घरोंदे बसे इन पर 
नर्म घास का ये फर्श
तुम्हे बुलाता, हाथ बढ़ाता, अर्श
ज़हन को साँस देती हवा
कितना कुछ है यहाँ 
बस नज़र नज़र का खेल है
आँखें बंद करो तो सब कुछ है
वरना जीवन जेल है 
थोड़ी तो फुरसत निकालो 
बैठो
सोचो ना कुछ
बोलो ना कुछ
रहो ना कुछ
यूँ भी तो करो कभी. 

अच्छा लगेगा.

4 comments:

Anonymous said...

Awesome work...I found a meaning for myself in it, felt nice after reading it :)
Thank you

Aadii said...

:)

Kopal said...

amazingg !

Aadii said...

:)