वो आँखें



वो आँखें
हँसते हुए भी मायूस लगती हैं
खिल खिलाना भूलीं
लड़ना झगड़ना रूठना मनाना भूलीं
ख़ालीपन लिए लगें सूनी सूनी
डांटना गुस्से में लाल होना, सब भूलीं
उनके पार दिखना अब बंद हुआ
सपने जो वहीं किसी कोने में पलते थे
अब वहाँ नहीं बसते 
वो झील जहाँ से आँसू बह निकलते थे 
कब की सूख चुकी
थकी हुई शामों को एक टक निहारती
वो आँखें
आशाओं की लौ जलाकर, प्रार्थनाएं करीं थी कुछ उन्होंने
आशायें अब भी हैं, प्रार्थनायें अब भी हैं
बस मकसद बदल गये हैं
तब ज़िंदगी के लिए फरियाद होती थी
अब ज़िंदा रहने के लिए..!