वो क्या है?



जो आंसू आँखों से बहा वो ख़ुशी है 
तो जो बहते बहते रुक गया वो क्या है?

जो हाथ पकड़ा तुमने वो साथ है
तो जो छूट गया वो क्या है?

उस दिन जो लम्हा थम गया वो 'याद' है
तो जो आगे बढ़ गया वो क्या है?

जो बात कह दी वो सब कुछ है
तो जो कह नहीं पाया वो क्या है?

जो मिल गयी वो ज़िंदगी है
तो जो खो गया वो क्या है?

कश्तियाँ



उस दिन
बारिश बहुत तेज़ हुई थी
गली में पानी भर आया था
बच्चे सड़कों पर
काग़ज़ की कश्तियाँ ले उतर आए
एक एक कर उन्होंने
अपनी अपनी कश्तियाँ बहानी शुरू कीं 

हर एक कश्ती काग़ज़ से कुछ ज़्यादा थी
उम्मीदें
संघर्ष
और कशमकश से बनी
डोलती हुई कश्तियाँ बहती जा रही थीं
पानी को सहती जा रही थीं
एक लड़ाई सी छिड़ गयी हो जैसे
कभी दायें डगमगातीं
कभी बायें किसी से टकरातीं
आपस में भिड़ती 
ठहरकर कुछ ठिठोली शुरू हो जाती 
दो कश्तियाँ मानो बहस कर रही हों
फिर एक बड़ी कश्ती पीछे से ठेलती
तो सब आगे बढ़ती जातीं
रंग बिरंगी सफ़ेद अखबारी
भीड़ बन उमड़ती जातीं
एक मेला सा लग गया हो जैसे
संगीत पर थिरकती
सुर से सुर जमातीं
होड़ से होड़ लगातीं
नुक्कड़ पर दो धारायें अलग अलग हो रही थीं
बस क्या था फिर
बंट गयीं कश्तियाँ 
कुछ एक रास्ते बहीं, कुछ दूसरे
कहीं धार तेज़ होती
तो तेज़ी से निकलतीं
कहीं कुछ अटकी भी रह जातीं
पानी गोल गोल घुमाता
तो मज़े से संग चक्कर खातीं
सफ़र था लेकिन
ख़त्म तो होना था
एक एक कर कश्तियाँ पलटती भी जातीं
काग़ज़ धीरे धीरे गल कर
पानी हो जाता
बहते बहते.. बह जाता
कश्तियों की किस्मत में सफ़र तो मुक़म्मल है
मंज़िल नहीं
अगर एक नज़रिए से देखें
कहीं ज़िंदगी भी ऐसी ही तो नहीं?

और पीछे से बच्चों ने
कुछ और कश्तियाँ पानी में छोड़ दीं
खेल ही है आख़िर.. 

रात

कहने को तो ये कुछ कहती नहीं 
लेकिन रात बात करती है 
तन्हाई लपेटे सोई सड़कें 
ठंड में ठिठुरते सन्नाटे 
थका हुआ उनींदा चाँद 
और चाँद के सहारे टिकी वो टहनी 
जादू भारी भीनी हवा 
साँस लो तो रूह को छू जाए 
बादलों में से दिखता एक तारा 
ये सब कुछ कहते हैं 
अनजान इशारे हैं रात के 
रात के साथ बहते हैं 
किसी की ना होके भी, रात सबकी है 
बात करती है इशारों से 
तुम कहोगे लेकिन कैसे ? 
जब ज़रूरत होगी, इशारे भी समझ आयेंगे 
बातें भी.