रात

कहने को तो ये कुछ कहती नहीं 
लेकिन रात बात करती है 
तन्हाई लपेटे सोई सड़कें 
ठंड में ठिठुरते सन्नाटे 
थका हुआ उनींदा चाँद 
और चाँद के सहारे टिकी वो टहनी 
जादू भारी भीनी हवा 
साँस लो तो रूह को छू जाए 
बादलों में से दिखता एक तारा 
ये सब कुछ कहते हैं 
अनजान इशारे हैं रात के 
रात के साथ बहते हैं 
किसी की ना होके भी, रात सबकी है 
बात करती है इशारों से 
तुम कहोगे लेकिन कैसे ? 
जब ज़रूरत होगी, इशारे भी समझ आयेंगे 
बातें भी.

4 comments:

Abhishek said...

good one!!!

Aadii said...

thnx a lot sir :)

Esha said...

hmm continuation....
parchayion se kuch kaano mein kehti
samudra mein thahake lagati
kabhi chanchal kabhi madhur
subah laane ke udashya ki oor
bhadti chali jaati
yeah raat kuch keh jaati :)
nice thought aadddiiii

Aadii said...

waah mam :)