कश्तियाँ



उस दिन
बारिश बहुत तेज़ हुई थी
गली में पानी भर आया था
बच्चे सड़कों पर
काग़ज़ की कश्तियाँ ले उतर आए
एक एक कर उन्होंने
अपनी अपनी कश्तियाँ बहानी शुरू कीं 

हर एक कश्ती काग़ज़ से कुछ ज़्यादा थी
उम्मीदें
संघर्ष
और कशमकश से बनी
डोलती हुई कश्तियाँ बहती जा रही थीं
पानी को सहती जा रही थीं
एक लड़ाई सी छिड़ गयी हो जैसे
कभी दायें डगमगातीं
कभी बायें किसी से टकरातीं
आपस में भिड़ती 
ठहरकर कुछ ठिठोली शुरू हो जाती 
दो कश्तियाँ मानो बहस कर रही हों
फिर एक बड़ी कश्ती पीछे से ठेलती
तो सब आगे बढ़ती जातीं
रंग बिरंगी सफ़ेद अखबारी
भीड़ बन उमड़ती जातीं
एक मेला सा लग गया हो जैसे
संगीत पर थिरकती
सुर से सुर जमातीं
होड़ से होड़ लगातीं
नुक्कड़ पर दो धारायें अलग अलग हो रही थीं
बस क्या था फिर
बंट गयीं कश्तियाँ 
कुछ एक रास्ते बहीं, कुछ दूसरे
कहीं धार तेज़ होती
तो तेज़ी से निकलतीं
कहीं कुछ अटकी भी रह जातीं
पानी गोल गोल घुमाता
तो मज़े से संग चक्कर खातीं
सफ़र था लेकिन
ख़त्म तो होना था
एक एक कर कश्तियाँ पलटती भी जातीं
काग़ज़ धीरे धीरे गल कर
पानी हो जाता
बहते बहते.. बह जाता
कश्तियों की किस्मत में सफ़र तो मुक़म्मल है
मंज़िल नहीं
अगर एक नज़रिए से देखें
कहीं ज़िंदगी भी ऐसी ही तो नहीं?

और पीछे से बच्चों ने
कुछ और कश्तियाँ पानी में छोड़ दीं
खेल ही है आख़िर.. 

3 comments:

Anuradha Sharma said...

ये तुम्हारी अब तक की सबसे बेहतरीन और सुलझी हुई सोच है
तुम्हारे मानसिक विकास को दर्शाती बेहद उम्दा कविता
वैसे शायद इससे कविता कहना भी ग़लत होगा
ये जीवन अभिप्राय है

Sweety said...

Un kashtiyon me jeevan ko dhund liya aapne, kashmakash to hamesha rehti hai par aage badti rehti hai zindagi. Congrats!

Aadii said...

@SKB, Thank you so much. I'm glad you like my poems :)

@Sweety, Thank you so much for appreciating and commenting :)