खत



काग़ज़ पर सहेज सहेज, लफ्ज़ पर लफ्ज़ जोड़कर
Cheesy बातों भरा
वो मखमली खत
जो कभी दिया नहीं
डायरी में ऊगा था
डायरी में ही रह गया
कितनी दफे लिखा, कितनी दफे काटा
कई अधपके ड्राफ्टों से निकल कर
रेशमी नज़्म सा
बातें करता मुझसे
कि तुम्हारा जवाब कैसा होगा
तुम पढ़ कर मुस्कुराओगी या नहीं
दिल उड़ेला था उस दिन
लेकिन देने की हिम्मत ना हुई
पॉकेट में घर से निकला था
पॉकेट में ही लौट आया
सारे खत अपने पते पर नहीं पहुँचा करते
ज़माना बीता 
वक़्त के साथ आँखों ने रंग बदला
कभी यादों का संदूक खोलता हूँ
तो जी करता है
कि वो 'पहला' खत दोबारा लिखूं.

4 comments:

Raphael said...

Ahhh, if i'm not mistaken the tribulations of that first love...beautifully penned down aditya...absolutely beautifully penned down..

Aadii said...

Thank you Varunda :)

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

खूबसूरत खत ... सुंदर प्रस्तुति

Aadii said...

dhanyawaad :)