तुमने उस रोज़ सच कहा था..



एक लम्हा कहीं किसी ज़माने से उड़कर
आँखों में आ बैठा है 
बह चला है आंसुओं से गीली हुई मुस्कान बनकर
हाथ बढाया कि थाम लूं, बाँध लूं 
रख लूं जेब में रुमाल के बीच सहेजकर
रख लूं वो खुशबुयें जो साथ चली आयी हैं
वो एहसास जो अब याद तक नहीं कि कैसे लगते थे 
तुम्हारा चेहरा जो अब बस लकीरों सा दिखाई देता है
उँगलियों का मेरी हथेली पर खेलना
शब्द घुल गए थे जो उस दिन ख़ामोशी में
अब सुनाई देते हैं
एक लम्हे में इतना कुछ भी हो सकता है
कभी सोचा नहीं था

उस रोज़ तुमने मेरा हाथ थाम
आँखों से जो कहा था, सच कहा था
जाने क्यों अब सारी कायनात झूठी लगती है?

4 comments:

Akanksha Gupta said...

I loved it... I was actually lost while reading it...and started remembering some of my spl. moments... n i guess isse badi tareef kuch hogi nahi... :-)

Aadii said...

Thank you so much :)

shahid ansari said...

खूबसूरत ...:)

Aadii said...

Thank you :)