शाम

पाँव गुदगुदा कर
लहरें वापिस समंदर में छुप जा रही हैं
भीनी हवा से उलझे बालों को सुलझा सुलझा कर
मैं पानी में डूबते सूरज को देखता जाता हूँ
वहीं सूरज के ठीक नीचे एक छोटा सा जहाज
किसी सहमे बच्चे की तरह खड़ा हुआ है
आज beach पर कोई नहीं है
सिर्फ़ शरारती लहरों का शोर है
मैं ढेर सारी सीपियाँ बटोरता हूँ
छोटी बड़ी चमकीली डरावनी और सुंदर
कुछ सोचता हूँ
फिर एक एक कर उन्हे वापिस पानी में फेंकता जाता हूँ
पैरों को रेत में धंसा कर
महसूस करता हूँ नीचे की रेत को लहरों संग फिसलते हुए
सारे खेल वही हैं, वो पत्थर भी वहीं है
पानी में पैर डाल मैं बैठ जाता हूँ उसपर
सोच रहा हूँ कि कुछ ना सोचूँ
पर तुम बार बार आ जाते हो, अच्छा है
पत्थर अभी भी उतना ही uncomfortable है
मैं वैसे ही लहरों को पीछे धकेलता हूँ
लेकिन अब ये और ढीठ हो गयी हैं
आँखें बंद कर चेहरे पर नम हवा  को महसूस करता हूँ
मानो तुम छू रहे हो
यहीं बैठ हम घंटों बातें किया करते थे
'और बताओ, और बताओ..' का दौर कभी ख़त्म ही नहीं होता था 
समन्दर से, शाम से, और सारी दुनिया से अनजान हो जाते
लहरें तब भी थीं, लहरें अब भी हैं 
लाख कोशिशों के बाद भी लेकिन बात नहीं हो पाती
अब ये शाम शोर बहुत करती है..

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