हम तुम

Had tears in my eyes when I saw this pic today. The poet in me tried to capture what I felt into a few words. But no words are enough to express how I actually felt at that time. And you know what the ironic thing is, I fall in the category that I've described in the first lines of the poem.

तुम पिज़्ज़ा बर्गर में खुश नहीं हो,
हमें सूखी रोटी में खुश रहना आता है.
तुम बाल्कनी में बैठ बारिश देखते हो,
हमें भीगते हुए बारिश में नाचना आता है.
तुम शिकायत करते नहीं थकते,
हमें शिकायतों पे मुस्कुराना आता है.
तुम हम पर तरस तक नहीं खाते, 
हमें तुम पर तरस आता है.
तुम करवटें बदलते रहते हो रात भर,
हमें पलक झपकते ही टूट कर सोना आता है.
तुम जी जी कर मरते हो रोज़,
हमें रोज़ मरकर जीना आता है.

2 comments:

1CupChai said...

bro...incredible work! m speechless.....few of us want to but I donno when this face of our society will actually get a face lift. good work!

Aadii said...

Thank you.