दर्द अजीब है



दर्द अजीब है
अजीब खेल खेलता है
धड़कन की रफ़्तार से उलझता है
कभी साँसों को दौड़ा देता है
आँखों में आग लगाता है
और कभी खून जमा देता है
दर्द अजीब है
भुलवा देता है कितनी बातें
कभी कितनी बातें समझा देता है
विश्वास खुदा पर कोई गर ना करे
दर्द वो भी सीखा देता है
एक एक आहट सुनाई देगी
कभी यूँ ही परछाई दिखाई देगी
सह सको तो सह लेना
कह सको तो कह देना
ज़मीन से आसमान में ले जाता है
और उड़ते हुए को ज़मीन पर लाता है
कभी मौत से रूबरू कराता है
कभी ज़िंदगी से मिला देता है
दर्द भी अजीब है
कमबख्त आदत बन जाता है .. 

कुछ गुम गया है


शामें हैं टटोली रातें हैं तलाशी
कुछ गुम गया है
यहीं तो था पास में
अभी कुछ देर पहले की ही बात है
हमेशा अपने साथ ही रखता था
कि कहीं खो ना जाए
मेरा है.. मुझसे छिन ना जाए
आसुओं से धोकर रखा था
एक दम साफ़ पाक़
दुआओं में लपेट कर
नर्म यादों के बीच
बड़े ही जतन से सहेजकर
लहू का कतरा है
आँखों के पीछे छुपाकर रखा था
यहीं तो था पास में, मुझमें
कहाँ गया
गुम गया है शायद
बहुत कुछ गुम गया है..

Stranger

Some friends even though you've known them for years, remain strangers. These people are just not open, they hide their true selves behind a veil of emotions, subconsciously. There is a certain quality, a kind of uneasiness which keeps them at a distance even when you claim to be the best of friends. How does it feel to be known in-and-out by a stranger? Or worse still, how does it feel to be that stranger? 

A few more days..


He said
Let me pluck happiness for you from the skies
And spread your paths with gentle flowers from the garden
Let me hide these tears somewhere far away in a treasure chest
And erase these aging lines from your face
Let me fill your eyes with the light of hope
And color your wishes
Let me scent your dreams, ifs and reality
And make everything better, and better
She said
No! not now
I want to live a few more days.. 

अब भी



कोहरे में ढकी बेचारी
वो बूढ़ी पहाड़ी
अब भी वहीं है
अब भी बहता है वो झरना
बारिश में इतराकर
मचलकर ज़िद्दी बच्चे सा

बोट हाउस की खिड़की से
चोरों जैसे रात को चाँद
अब भी नज़र आता है
अब भी वो चार चिनार 
बातें करते हैं
उतने ही नर्म दिल हैं

शिकारे में बैठकर दूर तक
परछाई ही परछाई नज़र आती है
अब भी पानी में अपने आप हाथ जाता है
अब भी वादी गुनगुनाती है
वो कश्मीरी लोक गीत
जो हमें कभी समझ नहीं आते थे

ठिठुरते काँपते हाथों को
वो चाय का प्याला
अब भी गर्माहट देता है
अब भी भीग जाती है रूह
वो पशमीना शॉल ओढ़ कर 
प्यार में, सुकून में

वक़्त कितना कुछ बदल देता है
लेकिन कुछ नहीं बदलता.