अब भी



कोहरे में ढकी बेचारी
वो बूढ़ी पहाड़ी
अब भी वहीं है
अब भी बहता है वो झरना
बारिश में इतराकर
मचलकर ज़िद्दी बच्चे सा

बोट हाउस की खिड़की से
चोरों जैसे रात को चाँद
अब भी नज़र आता है
अब भी वो चार चिनार 
बातें करते हैं
उतने ही नर्म दिल हैं

शिकारे में बैठकर दूर तक
परछाई ही परछाई नज़र आती है
अब भी पानी में अपने आप हाथ जाता है
अब भी वादी गुनगुनाती है
वो कश्मीरी लोक गीत
जो हमें कभी समझ नहीं आते थे

ठिठुरते काँपते हाथों को
वो चाय का प्याला
अब भी गर्माहट देता है
अब भी भीग जाती है रूह
वो पशमीना शॉल ओढ़ कर 
प्यार में, सुकून में

वक़्त कितना कुछ बदल देता है
लेकिन कुछ नहीं बदलता.

2 comments:

Abhishek said...

Subhaan Allah!!!

Aadii said...

Thank you sir