फिर एक दिन..



उँचे पहाड़ों पर दूर कहीं
सूरज की दस्तक से
अंगड़ाई ले जागा है
आँख खुल भी नहीं पाई थी
कि सर पर पैर रख कर भागा है

मुश्किल डगर थी चट्टानों भरी
टेढ़ी मेढ़ी ऊँची नीची
ठहरना नहीं था किस्मत में
जो रुकने की कोशिश भी करता
तो पीछे से ज़ोर का धक्का लगता

किसी तरह चलता गया
अपने वजूद को साथ ले बढ़ता गया
उन्माद था एक ज़हन में
मचलते खेलते रूप बदलता गया
पानी था.. पानी में मिलता गया

बचपन बीता मस्ती छूटी
गति हुई मद्धम, बाँहें और फैलीं
जिम्मेदारियों के बोझ तले दबता गया
सोचना नहीं था फ़ितरत में
तो बस.. आगे बढ़ता गया

समयकाल का खेल है
कुछ हाथों का छूटना, कुछ का मेल है
उसने भी रूप बदला, बदले अपने मिज़ाज़
नहीं बदला तो अंतर्मन
और मंज़िल का ख़याल

फिर एक दिन..

मंज़िल नज़र आई
जिसके लिए चला था
वो समंदर बाँहें फैलाए सामने खड़ा है
और कुछ भले ना सीखा हो
इतना तो वो सीख चुका है कि बिछड़ना क्या है
नियती, मंज़िल, अंजाम.. 
सारी बातें पता हैं लेकिन
कहीं कुछ तो अटका है
उस बेचारे को क्या पता
मंज़िल पर आकर उसे.. सफ़र से प्यार हो गया है..

2 comments:

1CupChai said...

truly inspirational! bhai i'm totally moved by this creation. God Bless you :)

Aadii said...

Thank you bhai :)