यादों का सेफ




यादों को समेट पाते गर हम
तो कितना अच्छा होता, नहीं?
एक डब्बे में बंद कर दिया
मजबूत सा ताला लगाकर चाबी को संभाल कर रख लिया
जब जी चाहा यादों से मिल लिया
नहीं तो पड़ीं हैं सेफ, उस सेफ में
लेकिन ये ढीठ यादें, मानती कहाँ हैं
जब मरज़ी उड़ जायें
जब मरज़ी आ जायें
जब मरज़ी धुंधली हो जायें, और फिर ना आयें
जब मरज़ी रंग बदल लें
और जब मरज़ी रास्ता 
कभी आँसुओं संग बरसें
कभी मुस्कुराहट में खिल जायें
कभी ज़हर सी कड़वी, कभी मिशरी सी मीठी
कभी झुलसा दें कोई भयानक ख़याल बन
और कभी छाती को ठंडक पहुंचा दें सुकून बन
बड़ी ढीठ हैं मुई यादें
इन्हें समेट पाते गर हम 
तो कितना अच्छा होता, नहीं?

ट्रेन का सफ़र



याद है
जब तुम छोटे थे
ट्रेन में सफ़र करने का शौक बस शुरू ही हुआ था
कैसे विंडो सीट के लिए झटपट भागते थे
ट्रेन स्टेशन छोडती, स्पीड पकड़ती
और तुम्हारी नज़रें जम जाती खिड़की से बाहर
पहले प्लॅटफॉर्म गुज़रता, फिर शहर
दूर तक निगाहों में तेज़ हवा और खेत के खेत समाते जाते
कभी जंगल आता, कभी छुट पुट कोई स्टेशन
तुम बाहर ही देखते रहते
खिड़की के बाहर की दुनिया पीछे भागती हुई मालूम पड़ती
होड़ ही होड़ में पेड़, सर पर पैर रख दौड़ लगाते
स्कूल बस के लिए जैसे सुबह भागते थे तुम
और पीछे से माँ टिफिन लिए दौड़ी चली आती थी 
वैसे ही कुछ इधर पेड़ों के पीछे से पहाड़ दौड़े आते
मानो कह रहे हों, "अरे रुक बेटा लंच-बॉक्स तो लेता जा!"
कभी कभार अलसाए-अजगर सी नदी आती, लेकिन वो भी सरकती जाती
और खेत, खेतों में  स्प्रिंक्लर, स्प्रिंक्लर से फुदकती पानी की फुहार
उन के बीच में हरी फसल से लंबी ऊगी एक झोपड़ी भी
सबके साथ भागती जाती
तुम्हारी नज़रें उसपर टिकी रहतीं, जब तक वो ओझल ना हो जाती
कुछ मंज़र छूटते, तो कुछ नये और आँखों में आते
पर रुकते नहीं, हमेशा चलते जाते, फिसलते जाते
और फिर..
तुम्हारा स्टेशन आ जाता 
तुम्हे लगता कि सब कुछ कितनी जल्दी गुज़र गया
झोपड़ी, शीशम-नीम-आम के पेड़, नदियाँ, खेत, पहाड़, स्प्रिंकलर्स और वो वक़्त 
सब कितने जल्दी कहाँ चले गये पता ही नहीं चला
लेकिन अभी तुम्हारी मासूम साँसों को अंदाज़ा नहीं है
कि वो कहीं नहीं गये, वहीं हैं..
बस तुम ज़रा आगे निकल आए हो..



एक बार और..


एक तालाब किनारे
एक बगुला अपने बच्चे को समझा रहा था
कि मछली कैसे पकड़ते हैं
छोटा बगुला बार बार ग़लतियाँ करता
कभी अपनी चोंच दायें मारता
कभी बायें
लेकिन मछली पकड़ में ना आती
बड़े बगुले ने उसे सौ दफे करके दिखाया
छोटे बगुले को तब भी समझ में ना आया
बस हर बार कहता, “एक बार और” करके बताओ ना
खेल चलता रहा
बड़ा ‘एक बार और’ करता रहा, छोटा ‘एक बार और’ देखता रहा
और धीरे धीरे छोटा बगुला सब सीख गया
समय निकला
छोटा हुआ बड़ा और बड़ा हो गया बूढा
एक दिन छोटा बगुला घर में कोई नया दाना लेकर आया
और बोला ये नयी चीज़ है खाकर देखो
बड़े को समझ नहीं आया कि कैसे खाए
बोला बेटा एक बार ज़रा खा कर तो दिखा कैसे खाते हैं
जल्दी में तो था ही, छोटे ने झट से खाकर बता दिया
बड़े ने बोला बेटा “एक बार और” बताओ बूढ़ी आँखों को ज़रा दिखाई नही पड़ा
“एक बार में कोई चीज़ समझ आती है तुम्हे?”
ऐसा कह छोटा बगुला बाहर उड़ गया ..

सच




सच चुभता है आँखों में
बहता नहीं कम्बख़्त ये
घुटन बन साँसों में यूँ घुलता है
घुल जाती है जैसे नमी हवा में
तलाश है इसे रास्तों की
एक अंधेरी कोठरी है जिसमें सहमा बैठा है
सच अंधेरा है घना जो रोशनी में फैला है
ठिठक जाते हैं पाँव अक्सर
सहम जाती है चाल
भींची हुई मुट्ठी में जकड़ा एक ख़याल
कब से इंतज़ार में है बह जाने के
साँसों से..

Defenses



We grow defenses around ourselves. A kind of shield, an invisible fence. We may have so many friends around us, but we have different layers of fences. Outermost fences, for acquaintances. Fences after that, for closer friends. Yet, there remain those innermost fences, which we don't allow anyone to cross. However close that friend is. These fences are our defenses, we keep on defending ourselves from even closest of our friends. Funny, isn't it?

When someone tries to cross these fences, tries to be too much of a helping hand, tries to be over-smart and intrude the privacy by crossing certain boundaries, we get alarmed. Cracks begin creeping up in the relationship, then. 

There is more to it. Everybody has their fences at different radii. Yours might be smaller than mine, or bigger. People who have seen pain, felt pain, have got hurt, expected too much, consequently have got disappointed too much, have made bad decisions, trusted the wrong people more often than the others, have much larger, stronger fences at a much larger radius. They don't want people to come closer any more, they don't want to open up with what all they have, they want their wounds only to remain with them, not to be touched, not to be shared, not to be healed. These are the ones who can become good friends, even best friends with many but don't usually have any good or best friends. 

जो तुम साथ होते



जो तुम साथ होते तो कितनी हसीं होती ज़िन्दगी..
जो होते कांटे राहों में, फूल बन तुम बिछ जाते 
जो तूफ़ान डगमगाता लौ को, सहारा देने तुम रौशनी बन जाते 
जो दोराहे मिलते चुनने को, अनुभव से तुम आसान बनाते
जो प्यास लगती अंधियारी रात में, तुम गंगा ला प्यास बुझाते 
जो हाथ कंपकंपाता कभी, तुम हाथ थाम आगे बढाते 
कितनी हसीं होती ज़िन्दगी जो तुम साथ होते
'आसान ज़िन्दगी मगर, ज़िन्दगी नहीं होती'
यही सोचा होगा ना तुमने मेरे लिए ..