सच




सच चुभता है आँखों में
बहता नहीं कम्बख़्त ये
घुटन बन साँसों में यूँ घुलता है
घुल जाती है जैसे नमी हवा में
तलाश है इसे रास्तों की
एक अंधेरी कोठरी है जिसमें सहमा बैठा है
सच अंधेरा है घना जो रोशनी में फैला है
ठिठक जाते हैं पाँव अक्सर
सहम जाती है चाल
भींची हुई मुट्ठी में जकड़ा एक ख़याल
कब से इंतज़ार में है बह जाने के
साँसों से..

4 comments:

Pranav Hundoo said...

Dard deta hai hai sach,
Saanso se beh ke,
Lekin chahe kaanto pe leta to,
Jhooth se to kam hi dukhta hai!

Aadii said...

Well said Pranav. But the "Sach" I referred to is different than yours I think. My "sach" is the "harsh bitter reality" which is "true", which is "sach".

Swati said...

another nice one :)

Aadii said...

Thank you :)