यादों का सेफ




यादों को समेट पाते गर हम
तो कितना अच्छा होता, नहीं?
एक डब्बे में बंद कर दिया
मजबूत सा ताला लगाकर चाबी को संभाल कर रख लिया
जब जी चाहा यादों से मिल लिया
नहीं तो पड़ीं हैं सेफ, उस सेफ में
लेकिन ये ढीठ यादें, मानती कहाँ हैं
जब मरज़ी उड़ जायें
जब मरज़ी आ जायें
जब मरज़ी धुंधली हो जायें, और फिर ना आयें
जब मरज़ी रंग बदल लें
और जब मरज़ी रास्ता 
कभी आँसुओं संग बरसें
कभी मुस्कुराहट में खिल जायें
कभी ज़हर सी कड़वी, कभी मिशरी सी मीठी
कभी झुलसा दें कोई भयानक ख़याल बन
और कभी छाती को ठंडक पहुंचा दें सुकून बन
बड़ी ढीठ हैं मुई यादें
इन्हें समेट पाते गर हम 
तो कितना अच्छा होता, नहीं?

1 comment:

सदा said...

यादें तो बस यादें होती हैं ...

http://sadalikhna.blogspot.in/2010/10/blog-post.html