बूँदें

अभी कल ही की बात है
दरख्तों पर बारिश की बूँदें नाचा करती थीं
टपक टपक कर मचलती हुई
सावन की ताल पर थिरकती हुई
पत्तों से उतरकर, फिसलकर, गिरकर,
संभलकर फिर ज़रा दूसरे पत्ते से होती हुई
पानी से पानी पर पानी लिखती हुई
वादी से बहती हुई आज ये सीधे
आँखों में चली आई हैं
आबशार बन ढल जायेंगी
अभी कल ही की बात है
जब इन बूंदों के मानी अलग हुआ करते थे ..

3 comments:

रश्मि प्रभा... said...

आज बूंदें अपने आप को ढूंढ रही हैं

दिगम्बर नासवा said...

बहुत खूब ... बदलती बूंदों के मायने ...

Aadii said...

Thank you :)