बोलो



एक पागलपन में जकड़े बेवजह जिए जाते हो 
भीड़ से भागने के लिए, भीड़ में समा जाते हो
कहते नहीं कभी लेकिन कितना कुछ सह जाते हो 
मकान को घर बनाते हो, और फिर घर तोड़ जाते हो
रिश्तों को दाँव पर लगा जाने क्या आज़माते हो
रोज़ रोज़ मरते हो आख़िर इतनी हिम्मत कहाँ से लाते हो
बोलो ~
सवालों के लिए जवाब, जवाबों के लिए सवाल तलाशते हो
भागने की कोशिश है सरपट तेज़, इतना किस से भागते हो
अंधेरे से डरते नहीं और उजालों से थर थर काँपते हो
प्यार पता नहीं किस चिड़िया का नाम है, और डीगें हांकते हो
टटोला नहीं रूह को, और दुनिया को हरदम इतना छानते हो
अपने दामन में ये उम्मीदों के नाग क्यूँ पालते हो ?
बोलो ~

2 comments:

Esha Gupta said...

bus itna hi kehna hai...aakhri line jitna hi dum hai poori poem mein.....gaana yaad aaya kuch naa kaho...kuch bhi naa kaho!!

Aadii said...

kya kehna hai.. kya sunna hai..
tumko pata hai.. humko pata hai.. :)