कश्मीर




केसर की रंगत लिए सुर्ख इंतज़ारी आँखें
रातों रातों तारों से बतियाती हैं

मीठी झेलम की खारी पगडंडियाँ रुखसारों पर
अक्सर ही उभर आती हैं

रूह को गर्माता यादों का पश्मीना
क्यों तुम्हारा एहसास कराता है

किसी बुत सी टकटकी लगाये ये चिनार
मुझसे पुराना शायद इनका तुमसे नाता है

पीर पांजाल के आगोश में सिमटी ये खूबसूरत वादी
कमबख्त चिढ़ाती है मुझे कि इसका कोई है

डल झील पर इठलाता ये हँसता मदमस्त शिकारा
कितना खुशकिस्मत है कि निर्मोही है

अब तुमसे और क्या कहूं

वो सुबहें कश्मीर.. वो शामें कश्मीर..
जब तुम याद आ जाओ.




5 comments:

Rajesh Kaushal said...

...उम्दा...!
:-)

Abhishek Mittal said...

Superb !!!

Anuradha Sharma said...

subhanallah

Simply astounding!! WOW

expression said...

बेहद खूबसूरत....
वो सुबहें कश्मीर.. वो शामें कश्मीर..
जब तुम याद आ जाओ.

वाह.....लाजवाब!!!

अनु

Aadii said...

Thank you everyone.