या शायद


College के उस लम्बे Lecture में
आख़िरी सीट पर किसी किताब से लगे

या शायद गर्मियों की दोपहरों में
खट्टे आम की मीठी छाँव तले  

या शायद ड्राइंग रूम के सोफे पर
माँ से नाराज़ रोते बिलखते औंधे पड़े

या शायद सर्दी की सुबहों के
उन और पांच मिनटों से सटे

या शायद गुदगुदाती किसी रात में
बाबा की कहानियों तले...

कुछ नींदे रखी हैं 
ज़रा पकड़ा दोगे ?