पगडंडियाँ


खेतों की आड़ से
सरसराती फसल के ज़रा ऊपर
चौमासी नदी के परे
पहाड़ों की तलहटी में कुण्डी जमाये
एक गाँव दिखाई देता है..

गाँव को कई पगडंडियाँ जाती हैं
एक पश्चिम में खेतों के बीच से
एक परबत से उतरती हुई उत्तर से
नदी के डैम पर से होती हुई पूरब से एक
एक पुरानी माता की मढ़िया से सटके
एक उस फक्कड़ पीर की मज़ार से होकर
तो एक पगडण्डी लाला-वाले-आम से सीधी सनसनाती हुई..
सब मदमस्त इतराती हुई गाँव को ही जाती हैं
पगडंडियों में जैसे होड़ लगी हो
कि कौन सी सबसे अच्छी
कौन सबसे तेज़
या कौन सबसे आरामदायक
एक बेचारी मंजिल और जाने कितने रास्ते
मानो गाँव न हुआ खुदा हो गया..

शाम का धुंआ फसलों पर चढ़ने लगा है
मैं अपनी पगडण्डी पकड़ गाँव की ओर निकल पड़ा हूँ.


साथ


हल्की हल्की रोशनी पड़ती है जब
जब हल्के हल्के दर्द के सफे खुलते हैं
कोहरे की चादर में सुबह ठिठुरती है जब
जब पर्वत के पत्ते ओस में धुलते हैं
घुल जाती हैं रात की अंगड़ाइयां जब
जब ख्वाबों के मीठे मौसम ढलते हैं
अक्सर करवटों की आड़ से निकलकर तब
तुम्हारा एक ख्याल आँखों में आता है
मैं कितना ही फिर सोने की कोशिश कर लूं
नींद टूटती है,
और तुम्हारा साथ छूट जाता है.