साथ


हल्की हल्की रोशनी पड़ती है जब
जब हल्के हल्के दर्द के सफे खुलते हैं
कोहरे की चादर में सुबह ठिठुरती है जब
जब पर्वत के पत्ते ओस में धुलते हैं
घुल जाती हैं रात की अंगड़ाइयां जब
जब ख्वाबों के मीठे मौसम ढलते हैं
अक्सर करवटों की आड़ से निकलकर तब
तुम्हारा एक ख्याल आँखों में आता है
मैं कितना ही फिर सोने की कोशिश कर लूं
नींद टूटती है,
और तुम्हारा साथ छूट जाता है.


2 comments:

Vidisha said...

aah.... very nice...! short and sweet!

Aadii said...

Thanks Vidisha :)