पगडंडियाँ


खेतों की आड़ से
सरसराती फसल के ज़रा ऊपर
चौमासी नदी के परे
पहाड़ों की तलहटी में कुण्डी जमाये
एक गाँव दिखाई देता है..

गाँव को कई पगडंडियाँ जाती हैं
एक पश्चिम में खेतों के बीच से
एक परबत से उतरती हुई उत्तर से
नदी के डैम पर से होती हुई पूरब से एक
एक पुरानी माता की मढ़िया से सटके
एक उस फक्कड़ पीर की मज़ार से होकर
तो एक पगडण्डी लाला-वाले-आम से सीधी सनसनाती हुई..
सब मदमस्त इतराती हुई गाँव को ही जाती हैं
पगडंडियों में जैसे होड़ लगी हो
कि कौन सी सबसे अच्छी
कौन सबसे तेज़
या कौन सबसे आरामदायक
एक बेचारी मंजिल और जाने कितने रास्ते
मानो गाँव न हुआ खुदा हो गया..

शाम का धुंआ फसलों पर चढ़ने लगा है
मैं अपनी पगडण्डी पकड़ गाँव की ओर निकल पड़ा हूँ.


3 comments:

Vidisha said...

nice!

skb said...

Aadi,

Mindblowing! Bahut is khuubsurat.. aap behad se bhi behad sundar likhte ho.. QATAL..

-
bujho koun!

Aadii said...

@Vidish, Thanqq :)

@SKB, Thanks a lot di :)