ग़ज़ल - 'वक़्त कितना लगता है'


नींद के जाने में वक़्त कितना लगता है
ख्वाब खो जाने में वक़्त कितना लगता है

सोचा था उड़ा करेंगे हम भी खुली हवा में
परों के कट जाने में वक़्त कितना लगता है

गुदगुदाती शरारतों से भरा हुआ बचपन था एक
बड़े हो जाने में वक़्त कितना लगता है

दोनों ने चाहा था मुस्कुराते हुए तोड़ेंगे रिश्ता
आँख नम हो जाने में वक़्त कितना लगता है

सोचते हो ज़िन्दगी पड़ी है तुम्हारे सामने
ज़िन्दगी गुज़र जाने में वक़्त कितना लगता है

बहुत महीन है इंसानियत की डोर
हैवान बन जाने में वक़्त कितना लगता है

अँधेरा बिखर गया है नज़र में तो क्या
एक उम्मीद सुलग जाने में वक़्त कितना लगता है.

चाँद की टप्पी


चाँद की टप्पी उठा कर उफक पर रख दी
डिब्बी में रखे कुछ तारे छिड़के
एक बोतल रात उड़ेली
ओस की कीलें ठोक एक सिरे बाँधी सुबह
एक सिरे फिर बाँधी शाम सतरंगी फीते से
आँखों में जोड़े कुछ ख्वाब रीते से
ख़ामोशी जोड़कर रात की सरगम बनाई
पहाड़ों से थोड़ी पुरवाई मंगाई
रात के कैनवास पर उँगलियों की गुलेल बना
साधा जो एक सटीक निशाना
सीधा उस तारे को जाकर लगा
तारा वो कुछ ऐसे गिरा
कि बंद मुट्ठी और बंद आँखों पर रखी
तुम्हारी दुआ बन गया..

मेरा काम हो गया,
अब तुम जो मर्ज़ी मांग लो..