ग़ज़ल - 'वक़्त कितना लगता है'


नींद के जाने में वक़्त कितना लगता है
ख्वाब खो जाने में वक़्त कितना लगता है

सोचा था उड़ा करेंगे हम भी खुली हवा में
परों के कट जाने में वक़्त कितना लगता है

गुदगुदाती शरारतों से भरा हुआ बचपन था एक
बड़े हो जाने में वक़्त कितना लगता है

दोनों ने चाहा था मुस्कुराते हुए तोड़ेंगे रिश्ता
आँख नम हो जाने में वक़्त कितना लगता है

सोचते हो ज़िन्दगी पड़ी है तुम्हारे सामने
ज़िन्दगी गुज़र जाने में वक़्त कितना लगता है

बहुत महीन है इंसानियत की डोर
हैवान बन जाने में वक़्त कितना लगता है

अँधेरा बिखर गया है नज़र में तो क्या
एक उम्मीद सुलग जाने में वक़्त कितना लगता है.

5 comments:

Hitesh said...

This is brilliant. It left me speechless.
The verse in the middle is the high point of the Ghazal. You placed it beautiful between other verses.

Hitesh

1CupChai said...

Bht acche :) :)

Aadii said...

Thanks :)

Pratibha Verma said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति। ।

sushma 'आहुति' said...

खुबसूरत अभिवयक्ति......