चाँद की टप्पी


चाँद की टप्पी उठा कर उफक पर रख दी
डिब्बी में रखे कुछ तारे छिड़के
एक बोतल रात उड़ेली
ओस की कीलें ठोक एक सिरे बाँधी सुबह
एक सिरे फिर बाँधी शाम सतरंगी फीते से
आँखों में जोड़े कुछ ख्वाब रीते से
ख़ामोशी जोड़कर रात की सरगम बनाई
पहाड़ों से थोड़ी पुरवाई मंगाई
रात के कैनवास पर उँगलियों की गुलेल बना
साधा जो एक सटीक निशाना
सीधा उस तारे को जाकर लगा
तारा वो कुछ ऐसे गिरा
कि बंद मुट्ठी और बंद आँखों पर रखी
तुम्हारी दुआ बन गया..

मेरा काम हो गया,
अब तुम जो मर्ज़ी मांग लो..


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