ग़ज़ल - 'काफी एक ख़याल है'


नज़र में धुंध, रूह में कश्मकश, ज़हन में बवाल है
मैं बढ़िया हूँ आप सुनाओ, कैसा हाल-चाल है? 

छोड़ा घर, खोई मंज़िल, पाये नए रास्ते
सफ़र में ही गुज़रेगा ये जो आने वाला साल है

अंधेरों में नज़र का हाथ थामने वाले जुगनू
खुद भटकते फिरते हैं, उनका भी हाल बेहाल है

सबको मालूम है जीने को बस चंद लम्हे ही हैं मिले
फिर भी 'जीते' क्यूँ नहीं, खटकता ये सवाल है

मज़हब, नस्ल, रंग या दौलत के नाम पर 
तफ़रीक़* क्यूँ जब सबका ही खून लाल है 

कह देता अगर उस दफे, तो ज़िन्दगी कुछ और होती
कहा नहीं, दिल को ये मलाल है

साँसों में भर लिए पहाड़, दरिया और शजर*
रहना चाहो खुश तो काफी बस एक ख़याल है.


(*तफ़रीक़ = Discrimination)
(*शजर = Tree)

(Image credit)


वहाँ


जिस मुकाम पर
आंसू ढलते ढलते मुस्कान बन जाएँ
और मुस्कुराहटें आँखों से छलकती जाएँ
जहां रह जाएँ न दर्द के निशाँ
जहां तितलियों में तब्दील हो जाएँ सारे अरमां
गरम चाय को नसीब हों शामें सुकूनी
तेरी ज़ुल्फ़ों को सहलाएं हवाएं बातूनी
कोई चुटकुला
कोई कहानी
कोई नज़्म
या कोई बेसुरा गाना
किसी न किसी बहाने से
मैं तुम्हे बस हंसाता रहूँ..
जिस मुकाम पर
इश्क़ का नाम भूल जाएँ हम
आओ चलें वहाँ, किसी weekend पर.