रास्ता



मैं देखता हूँ रास्ते को और सोचता हूँ
कि ये जो रास्ता है ये अगर थोड़ा कम पथरीला होता
थोड़े कम कांटे और कांच होते इसमें 
कि अगर ये थोड़ा छोटा होता
तो क्या तब भी मंज़िल उतनी ख़ूबसूरत लगती?

और ये भी सोचता हूँ मैं
कि अगर
सफर में जो पड़ाव मिले
ठण्ड में जो अलाव मिले
वहाँ थोड़ी देर और ठहर पाता
थोड़ी देर और रूह सेक पाता
जो यार दोस्त बने, उनसे उतना जुड़ता नहीं
सुकून में शामें फूंक के धुंआ करता नहीं
तो क्या तब भी उन्हें पीछे छोड़ने का दर्द उतना होता?

मैं देखता हूँ रास्ते को और सोचता हूँ
कि हर मुकाम आखिर बस एक पड़ाव क्यों है?
कि कैसा जूनून है, सफर से इतना जुड़ाव क्यों है?
कि ख़्वाबों के पीछे जो मंज़िल है, वो कैसी होगी?
कि उस नुक्कड़ पर माँ, क्या अब भी इंतज़ार में खड़ी होगी?
मैं देखता हूँ रास्ते को और सोचता हूँ.



"अलार्म क्लॉक"


नींदों के भीतर
एक ख़्वाबों की दुनिया है जहाँ
जो चाहो वो होता है
जहाँ ज़िंदा होती हैं चाहें
जहाँ घर होता है

जहाँ एक दिये सी जलती है रात
जिसकी रोशनियाँ पकड़ मैं पार कर जाता हूँ दर्द के भंवर
जिसकी गर्माहट में गुज़र जाती हैं सदियाँ
जहाँ वक़्त थम जाता है
आँखों में एक आंसू सा जम जाता है
जहां खिलते हैं टेसू के फूल हर मौसम में
और हर मौसम में उड़ती हैं पतंगें

नींदों के भीतर
उस ख़्वाबों की दुनिया में
इस ख़्वाबों की दुनिया को भूल जाता हूँ
तभी एक 'एम्बुलेंस' के 'साइरन' सा कुछ सुनाई देता है
साथ एक धुंधला साया दिखाई देता है
और आँख खुल जाती है

"अलार्म क्लॉक" से ये जो ज़्यादती दुश्मनी है मेरी
ये खामखा नहीं है.

बादलों के ठिकाने


बादल हैं हम, बादलों के ठिकाने कहाँ
मोड़ दें घरों की ओर जो कदम, जेबों में वो बेबाक बहाने कहाँ

घर से जब निकले थे तब क्या सोचा था
कि राहों को उम्र से लम्बा पाएंगे
पलटना चाहेंगे कितना ही
मगर पलट न पाएंगे

बादल हैं हम, बादलों के ठिकाने कहाँ
सुकून की नींद जो दे सकें , अब वो गोद के सिरहाने कहाँ

रहते हैं मशगूल अब
दिनों को गुज़ारने में
कभी शामें ज़ाया होती थीं
शर्मा आंटी के घर से बॉल निकालने में

बादल हैं हम, बादलों के ठिकाने कहाँ
ज़िद नहीं बेबसी है, तुम भी निकले हो मनाने कहाँ

तब आँखों में आसमान था
और नज़र में परवाज़ थी
अब आँखों में ज़मीं है
और ज़हन में आवाज़ है

बादल हैं हम, बादलों के ठिकाने कहाँ
वादे किये थे जो, चले थे निभाने कहाँ

जो पाना था वो क्या था
जो पाया है वो क्या है
चक्रव्यूह में अभिमन्यु ने 
क्या ऐसे ही सोचा होगा?

बादल हैं हम, बादलों के ठिकाने कहाँ
मगर सोचें तो
घर की ओर जाने का
अपनी ज़मीन में मिल जाने का
एक रास्ता है

बस, एक ही रास्ता है.. 

सब कुछ भुला कर
ग़मों को गला कर
खुद को मिटा कर
औरों को जिता कर
बरसना होगा

बस, दिल खोल बरसना होगा..
बादल को
ज़मीन की गोद तभी मिलेगी.

तब 
सौंधी सौंधी महकेगी ज़मीन
और शायद कहेगी
"मेरा बेटा.. घर लौट आया है.."




एक नज़्म की कोख में

एक नज़्म की कोख में
अनगिनत दर्दों के बीज समाये होते हैं
अल्फ़ाज़ों के रूप में
कभी कागज़ की तो कभी डिजिटल स्क्रीन की ज़मीन पर
पौध से खिल जाते हैं
नज़्म की कोख में ही
उन किस्सों को चेहरे मिलते हैं
जिनको सबसे छुपाकर रखा होता है.

एक हलक में अटकी हुई बात,
एक आंसू के सूखते निशाँ
एक लम्बी खामोश रात
अपने मानी* को मुक़म्मल* होते हैं
नज़्म की कोख में ही.

अनछुए ज़ख्मों को कुरेद कर
पथराई उँगलियों से टटोलकर
ढूंढते हैं वो लम्हात
जो कभी ज़िंदा हुआ करते थे.
नज़्म -
अल्फ़ाज़ दर अलफ़ाज़
एहसास दर एहसास -
सांस भर देती है माज़ी* में.

और जब..
होश आता है
तो हकीकत से दम फूल जाता है
मगर, कागज़ पर एक नज़्म सांस ले रही होती है.. 


मेरे कुछ दोस्त कहते हैं
"यार, अच्छा लिखते हो, और लिखा करो"..


[मानी = Meaning]
[मुक़म्मल = Complete]
[माज़ी = Past]

मूंदी पलकों के नीचे..

सोचो
क्या होता गर आँख बंद कर हम
देख पाते ये दुनिया
पढ़ लेते कितनी और नज़्में, किस्से, कहानियाँ..
जान लेते थोड़ी और बेमतलब की खबरें
कर लेते थोड़ी और tweeting, facebooking, instagramming..
देख लेते थोड़े और TV shows और movies
judge कर लेते थोड़े और चेहरे
कर लेते थोड़ी देर और मन का
सोचो क्या होता 
गर मूंदी पलकों के नीचे से
सुनाई देती खुश्बुएं
जी उठते गुज़रे लम्हात
खुल जाती आंसुओं से हंसी की लड़ियाँ
ख़्वाबों के फूल खिल जाते हकीकत के दरख्तों पर
सोचो ज़रा..

तुम मुझसे मिल लेते
मैं तुमसे
मूंदी पलकों के नीचे..

रात और दिन

रात और दिन
सच में उलटे हैं
जैसे एक ही कोख से जन्मे
दो अलग-अलग फितरत के भाई बहन..

दिन बोलता बहुत है,
लेकिन कुछ कहता नहीं.

रात कुछ नहीं बोलती,
लेकिन बहुत कुछ कह देती है.


दरमियां

ना तुम आगे बढ़े
ना मैं हाथ बढ़ा पाया
ना तुमने तोड़ी खामोशियाँ
ना मैं आसमां रंग पाया
सब्ज़ [green] ज़मीं की चाह तो थी
लेकिन पथरीले रास्तों का डर भी था
एक रिश्ता वादी के मौसमी पत्ते सा
रंग बदलते-बदलते ज़र्द [pale yellow] हो गया

दरमियां रह गए बस कुछ सूने रास्ते
जो तरसते रहे मुसाफिर को.


That moment..

And then there is that moment,
when you become your sighs,
when the heart beats in unison with your pain,
when the eyes run out of tears,
when numbness takes over.
You stay still, very still,
when the only thing you see
and you care about
is that moment.
That one instant,
that taste of infinity,
when nothing,
absolutely nothing else matters.
And then you smile.

नज़र का सफ़र


रात के चुप्पी भरे आसमान में
एक तारे से दूसरे तारे तक
एक आकार से दूसरे आकार तक
फुदकती रहती है नज़र
भटकती रहती है नज़र
जाने क्या खोज रही है
जाने किसे ढूंढ रही है
कभी बादलों से उलझना
कभी चाँद से झगड़ना
कभी टूटते तारे पर हंसना
अपनी ही धुन में सवार है
दिलचस्प है इसका सफ़र
थक जाती है तो सो लेती है
कभी कभी यूँ ही रो लेती है
रात की गिरह नहीं खुलती लेकिन
आसमान का कोई सिरा नहीं मिलता
नज़र परेशान है.
एक सिरा मिल जाए,
तो आज़ाद हो जाये..


Special shout-out for @Catharsee


सजदा


एक ख़ामोशी से भरी वादी
कुछ चिनार के पेड़
बादलों के लम्स से गुदगुदाते पहाड़
आईने सी झील
एक पंछियों का झुण्ड
टेढ़ी मेढ़ी पगडण्डी
पुराना किला
और भीनी भीनी हवा
सब मुझसे ये कहते हैं
जब तू हंसती है
ये सजदे में रहते हैं. 

*लम्स = Touch
*सजदा = Prayer

पिट्टू (pittoo) का सच


तमाम दुनिया का चक्कर लगा कर
सबसे जीत, खुद से हार कर
थके पांवों से जब मैं अपने शहर लौटा
तो ज़रा मायूस लौटा.

सच की तलाश में जो सफ़र था जिया 
वो सफ़र आज घर लौट रहा था
सारी कायनात में खोजा जिस सच को
वो कहीं नहीं मिला
बादलों से रास्ते पूछे
पर्वतों से पते निकाले
वादियों की सरगोशियों में इसके किस्से सुने
मगर जो भी मिला, जितना भी मिला 
कुछ उखड़ा उखड़ा सा मिला 
झूठ की परतों पर परतें मिलीं
चेहरों पर गिले-शिकवे, झगडे और समझौते
गालों पर सूखे आंसुओं के निशाँ
आँखों में दर्द के साये पलते हुए मिले
कहीं सच नहीं मिला 
कहीं ख़ुशी नहीं मिली 
कहीं खुदा नहीं मिला

आज जब थक-हार कर
अपने घर के करीब पहुंचा
तब ध्यान मोहल्ले में खेलते हुए बच्चों पर गया
करीने से रखे हुए पिरामिड के आकार में पत्थर के ऊपर पत्थर
एक गेंद हवा में
लहराती हुई
उन छोटे पत्थरों से टकराती हुई
हवा में उछलते हुए पत्थर
कुछ बच्चे गेंद की ओर भागते हुए
तो कुछ बच्चे पत्थरों को वापिस जमाने की ताक में 
"पिट्टू (pittoo) बना!", "बॉल मार!", का शोर
बच्चों का ध्यान खेल पर था
और मेरा बच्चों पर
इतनी शिद्दत से मैंने ज़िन्दगी में कभी कुछ नहीं चाहा था
जितनी शिद्दत से ये बच्चे पिट्टू बनाना चाह रहे थे
मानो उनकी दुनिया बस उस एक पत्थरों के पिंड - "पिट्टू" पर टिकी हो

ध्यान लगाना इसी को तो कहते हैं
यही चाबी है
यही 'सच' है.

मैं हँस पड़ा
खामखा सच की तलाश में इतना भटका!