नज़र का सफ़र


रात के चुप्पी भरे आसमान में
एक तारे से दूसरे तारे तक
एक आकार से दूसरे आकार तक
फुदकती रहती है नज़र
भटकती रहती है नज़र
जाने क्या खोज रही है
जाने किसे ढूंढ रही है
कभी बादलों से उलझना
कभी चाँद से झगड़ना
कभी टूटते तारे पर हंसना
अपनी ही धुन में सवार है
दिलचस्प है इसका सफ़र
थक जाती है तो सो लेती है
कभी कभी यूँ ही रो लेती है
रात की गिरह नहीं खुलती लेकिन
आसमान का कोई सिरा नहीं मिलता
नज़र परेशान है.
एक सिरा मिल जाए,
तो आज़ाद हो जाये..


Special shout-out for @Catharsee


2 comments:

keshav singh gurjar said...

nazar ke afsane kai hai
isske deewane bhi kai hai

Vidisha said...

nice poem !